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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1232 of 1416

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Page 1232

१२०० भैषज्यरत्नावली । [ नेत्ररोग-

यह अञ्जन नेत्रोंमें नित्यशः आँजनेसे तिमिर, पटल, अन्धकार, पिच्छिट, शुक्र और अर्बुदादि रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है और दृष्टिको प्रसन्न करता है। इसको निरन्तर सेवन करनेसे सौ वर्षतक भी दृष्टिशक्ति नष्ट नहीं होती ॥ ३६ ॥

व्रणशुक्रहरीवर्त्ति।

चन्दनगैरिकलाक्षामालतीकलिकाः समाः ।
व्रणशुक्रहरी वर्त्तिः शोणितस्य प्रसाद्नी ॥ ३७ ॥

लालचन्दन, गेरू, लाख और चमेलीकी कलियें इन सबको समानांश लेकर वर्षाके जलमें खरल करके छायामें सुखाकर बत्ती बनावे। इस बत्तीको शहदमें घिसकर नेत्रोंमें आँजनेसे रक्तज व्रण शुक्ररोग दूर होता है ॥ ३७ ॥

दन्तवर्त्ति ।

दन्तैर्दन्तिवराहोष्ट्रगवाश्वाजखरोद्भवैः ।
सशंखमौक्तिकांम्भोधिफेनैर्मरिचपादिकैः ॥
क्षतशुक्रमपि व्याधिं दन्तवर्त्तिर्निवर्त्तयेत् ॥ ३८ ॥

हाथी, सूकर, ऊँट, गौ, घोडा, बकरा और गधा इनमेंसे किसी एक जीवका दाँत एवं शंख, मोती और समुद्रफेन ये प्रत्येक द्रव्य एक एक तोला और काली-मिरच तीन माशे लेवे। सबको एकत्र जलके साथ बारीक पीसकर बत्ती प्रस्तुत करे। यह दन्तवर्त्ति यथाविधि प्रयोग करनेसे नेत्रोंके क्षतशुक्र रोगको निवारण करती है ॥ ३८ ॥

सुखावतीवर्त्ति ।

कतकस्य फलं शंखः त्र्यूषणं सैन्धवं सिता ।
फेनो रसांजनं क्षौद्रं विडङ्गानि मनःशिला ॥ ३९ ॥
कुक्कुताण्डकपालानि वर्त्तिरेषा व्यपोहति ।
तिमिरं पटलं काचमर्म शुक्रं तथैव च ॥
कण्डूक्लेदार्बुदं हन्ति मलं चाशु सुखावती ॥ १४० ॥

निर्मलीके फल, शंखनाभिकी भस्म, सोंठ, मिरच, पीपल, सैंधानोन, मिश्री, समुद्रफेन, रसौत, वायविडङ्ग, मैनसिल और मुर्गीके अण्डेके छिल्के इन सबको बराबर बराबर लेकर शीतल जलमें खरल करके बत्ती बनालेवे। यह बत्ती शहदमें मिलाकर लगानेसे नेत्रोंके तिमिर, पटल, काच, अर्म, शुक्र, कण्डू, क्लेद, अर्बुद और मैलादि विकारोंको तत्काल हरण करती है ॥ ३९ ॥ १४० ॥