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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1230 of 1416

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Page 1230

११९८ भैषज्यरत्नावली । [ नेत्ररोग-

बृहद्वासकादि ।
वासाघनं निम्बपटोलपत्रं तिक्तामृताचन्दनवत्सकत्वक् ।
कलिङ्गदार्वीदहनानि शुंठीभूनिम्बधात्रीत्वग्भयाविभीतम् ।
श्यामायवक्वाथमथाष्टभागं पिबेदिमं पूर्वदिने कषायम् ॥२६॥
तैमिर्यकण्डूपटलार्बुदं च शुक्लं तथा सव्रणमव्रणं च ।
निहन्ति सर्वान्नयनामयांश्च भृगूपदिष्टं नयनामयेषु ॥ २७ ॥
अडूसकी छाल, नागरमोथा, नीमकी छाल, परवल, कुटकी, गिलोय, लाल चन्दन, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ, दारुहल्दी, चीता, सोंठ, चिरायता, आमले, हरड, बहेडा, शारिवा और जौ इन सब औषधियोंका अष्टावशेष क्वाथ बनाकर प्रतिदिन प्रातःकाल पान करनेसे तिमिर, खुजली, पटल, अर्बुद, शुक्र, व्रण और अव्रणादि समस्त नेत्रसम्बन्धीरोग नष्ट होतेहैं। यह क्वाथ सर्व प्रकारके नेत्ररोगमें हितकारी है ऐसा भृगुजीने कहा है ॥ २६ ॥ २७ ॥

कज्जल ।
संगृह्योपरतानलक्तरकसेनाम्नृज्य गण्डूपदान्
लाक्षारञ्जिततूलवर्तिमिलितान्यष्टीमधून्मीलितान् ।
प्रज्वाल्योत्तमसर्पिषाऽनलशिखासन्तापजं कज्जलं
दूरासन्ननिशान्ध्यसर्वतिमिरप्रध्वंसकृच्चोदितम् ॥ २८ ॥
मरेहुए केंचुएको लेकर आलके जलमें सात दिनतक भिगोकर धूपमें सुखा लेवे। जब वह अच्छे प्रकार सूखजाय तब उसका चूर्ण करके उसकी बराबर भाग मुल-हठीका चूर्ण मिलालेवे। फिर उस समस्त चूर्णको आलके बीचमें रखकर डोरेसे बाँधकर बत्ती बनालेवे। फिर उसबत्तीको घर्मिं सानकर अग्निपर तपावे और उसके नीचे एक काँचका बर्त्तन रखदेवे। इसप्रकार करनेसे उस बर्त्तनमें जो कज्जल गिरे उसको लेकर नेत्रोंमें आँजनेसे दूरान्ध्य, आसन्नान्ध्य और सर्वप्रकारका तिमिररोग नष्ट होता है ॥ २८ ॥

श्रीनागार्जुनञ्जन ।
त्रिफलाव्योषसिन्धूत्थयष्टितुत्थरसाम्जनम् ।
प्रपौण्डरीकं जन्तुघ्नं लोध्रं ताम्रं चतुर्दश ॥ २९ ॥
द्रव्याण्येतानि सञ्चूर्ण्य वर्त्तिः कार्या नभोऽम्बुना ।
नागार्जुनेन लिखिता स्तम्भे पाटलिपुत्रके ॥ १३० ॥