भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । [ ११९३
नेत्ररोगमें उक्त पीडा होनेपर क्या करना चाहिये इसको कहते हैं:-दूब, जौ, गेरू और अनन्तमूल इनको समान भाग लेकर घृतमें पीसकर नेत्रोंपर लेप करे तो नेत्रोंकी पीडा और लाली दूर होती है ॥ ९७ ॥
पयस्याशारिवापत्रमञ्जिष्ठामधुकैरपि ।
अजाक्षीरान्वितैर्लेपः सुखोष्णः पथ्य उच्यते ॥ ९८ ॥
क्षीरकाकोली, अनन्तमूल, तेजपात, मंजीठ और मुलहठी इनको समानांश लेकर बकरीके दूधमें खरल करके अग्निपर कुछ एक गरम कर नेत्रोंपर सुहाता २ लेप करें तो शीघ्र आराम होता है ॥ ९८ ॥
वातघ्नसिद्धे पयसि सिद्धं सर्पिश्चतुर्गुणे ।
काकोल्यादिप्रतीवापं तद्युञ्ज्यात्सर्वकर्मसु ॥ ९९ ॥
भद्रदार्वादिगणोक्त औषधियोंके द्वारा सिद्ध किया हुआ दूध चार सेर और काकोल्यादिगणकी औषधियोंका कल्क समान भाग मिश्रित सोलह तोला तथा घृत एक सेर लेकर सबको एकत्र मिश्रित करके उत्तम प्रकार घृतको सिद्ध करे इस घृतको नस्य, पान और अभ्यंजनादि सर्व कर्मोंमें प्रयोग करना चाहिये ९९
शाम्यत्येवं न चेच्छूलं स्निग्धस्विन्नस्य मोक्षयेत् ।
ततः शिरां दहेच्चापि मतिमान् कीर्त्तितं यथा ॥ १०० ॥
यदि उपर्युक्त क्रियासेभी नेत्रोंका शूल न शान्त हो तो स्निग्धस्वेद देकर रोगीकें ललाटकी शिराका वेधकर रक्तमोक्षण करे और उस स्थानको दग्ध करदेवे १००
दृष्टेरथ प्रसादार्थमञ्जनं शृणु मे शुभे ।
मेषशृङ्गस्य पत्राणि शिरीषधवयोरपि ॥ १ ॥
मालत्याश्चापि तुल्यानि मुक्तां वैदूर्यमेव च ।
अजाक्षीरेण संपिष्य ताम्रे सप्ताहमावपेत् ॥
प्रणिधाय तु तद्वर्त्ति योजयेदञ्जने भिषक् ॥ २ ॥
अब मैं दृष्टिकी प्रसन्नताके लिये अञ्जन कहता हूँ उसको सुनो । मेढासिङ्गी, सिरस, धव और चमेली इन सबके फूल, मोती और वेडूर्यमणि, इन सबोंको समान भाग लेकर बकरीके दूधमें पीसकर ताँबेके बर्त्तनमें सात दिनतक रक्खे, फिर उसकी बत्ती बनालेवे । उस बत्तीको नेत्रोंमें आँजनेसे नेत्रगत सर्व प्रकारकी पीडा नष्ट होती है ॥ १०१-२ ॥