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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1213 of 1416

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Page 1213

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११८१

सफेद लोध, हरड, बहेड़ा, आमला, मुलहठी, चीनी और नागरमोथा इनको एकत्र उत्तम प्रकारसे कूट पीसकर कुछ एक शीतल जलमें घोलकर नेत्रोंपर सेचन करे तो इससे रक्तजनित नेत्ररोग नाश होता है ॥ २८ ॥

कशेरुमधुकानां च चूर्णमम्बरसंवृतम् ।
न्यस्तमप्स्वान्तरिक्षासु हितमाश्च्योतनं भवेत् ॥२९॥

कशेरू और मुलहठीके चूर्णकी पोटली बनाकर उसको वर्षाके जलमें भिजोकर नेत्रोंमें सेचन करे तो रक्तज चक्षुरोग आराम होता है ॥ २९ ॥

दार्बी पटोलं मधुकं सनिम्बं पद्मकोत्पलम् ।
प्रपौण्डरीकं चैतानि पचेत्तोये चतुर्गुणे ॥ ३० ॥
विपाच्य पादशेषं तु तं पुनः कुडवं पचेत् ।
शीतीभूते तत्र मधु दद्यात्पादांशिकं ततः ॥
रसक्रियैषा दाहाश्रुरोगशोथरुजापहा ॥ ३१ ॥

दारुहल्दी, पटोलपत्र, मुलहठी, नीमके पत्ते, पद्माख, नील कमल और पुण्डरिया इन सबको समान भाग मिश्रित चार पल लेकर चौगुने जलमें पकावे । जब पककर चौथाईभाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर एक कुडव परिणाम उस क्वाथको दूसरीवार पकावे । जब पकते पकते गाढा होजाय तब नीचे उतारकर शीतल होजानेपर उसमें चार तोले शहद मिलादेवे । यह रसक्रिया है । इसको आँखोंमें लगानेसे दाह, अश्रुपात, सूजन, वेदना और रक्तज अभिष्यन्द नष्ट होता है ॥ ३० ॥ ३१ ॥

तिक्तस्य सर्पिषः पानं बहुशश्च विरेचनम् ।
अक्ष्णोरपि समन्ताच्च पातनं तु जलौकसः ॥
पित्ताभिष्यन्दशमनो विधिश्चाप्युपपादितः ॥ ३२ ॥

रक्तज अभिष्यन्दमें तिक्त (वक्ष्यमाण पटोलादि) घृतकों पान करना, वारंवार विरेचन और नेत्रोंके चारों ओर जोंक लगवाकर रक्त निकलवाना एवं पित्तज अभिष्यन्दनाशक समस्त क्रिया करना श्रेष्ठ है ॥ ३२ ॥

शिग्रुपल्लवनिर्यासः सुघृष्टस्ताम्रसम्पुटे ।
घृतेन धूपितो हन्ति शोथघर्षाश्रुवेदनाः ॥ ३३ ॥

सहिंजनेके पत्तोंके रसको ताँबेके संपुटमें घिसे । फिर घृतमें मिलाकर उसकी धूप देवे तो इससे नेत्रोंकी सूजन, पीडा और आँसुओंका गिरना दूर होता है ॥ ३३ ॥