भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context११७४ भैषज्यरत्नावली । [ नासारोग-
लालचीतेकी जडका रस, आंमलोंका रस, गिलोयका रस और दशमूलका क्वाथ इन सबोंको पृथक् पृथक् सौ सौ पल लेकर एकत्र मिलादेवे। फिर उसमें हरडका चूर्ण एक आढक और गुड सौ पल डालकर विधिपूर्वक पकावे। जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब उसमें सोंठ, मिरच, पीपल, दारचीनी, इलायची और तेज-पात इन समस्त औषधियोंके १२ पल चूर्ण और दो तोले जवाखारको डालकर सबको चलाकर एकमएक करलेवे। फिर दूसरे दिन उसमें एक प्रस्थ उत्तम शहद मिलाकर स्वच्छ पात्रमें करके रखदेवे। उसमेंसे प्रतिदिन अपनी अग्निके बलाबलको विचारकर उचित मात्रासे सेवन करे तो जठराग्नि अत्यन्त प्रदीप्त होती है। यह चित्रकहरीतकी क्षय, खाँसी, पीनस, दुस्तर कृमिरोग, गुल्म, उदावर्त्त, बवासीर, दारुण श्वासप्रभृतिरोगोंको नष्ट करती है ॥ २१-२३ ॥
पाठाद्यतैल ।
पाठाद्विरजनीमूर्वापिप्पलीजातिपल्लवैः ।
दन्त्या च तैलं संसिद्धं नस्यं संपक्वपीनसम् ॥ २४ ॥
पाठ, हल्दी, दारुहल्दी, मूर्वा, पीपल, चमेलीके पत्ते और दन्तीकी जड इनके कल्कद्वारा सरसोंके तेलको यथाविधि पकाकर पक्व पीनसरोगमें नस्यद्वारा प्रयोग करे ॥ २४ ॥
व्याघ्राद्यतैल ।
व्याघ्रीदन्तीवचाशिग्रुसुरसाव्योषसैन्धवैः ।
पाचितं नावनं तैलं पूतिनासागदापहम् ॥ २५ ॥
कटेरी, दन्ती, वच, सहिंजना, सिह्नालु, त्रिकुटा और सैंधानमक इनके कल्क-द्वारा पकायाहुआ तेल नस्यद्वारा ग्रहण करनेसे पूतिनासारोगको हरता है ॥
त्रिकट्वाद्यतैल ।
त्रिकटुकविडङ्गसैन्धवबृहतीफलशिग्रुसुरसदन्तीभिः ।
तैलं गोजलसिद्धं नस्यं स्यात्पूतिनस्यस्य ॥ २६ ॥
सोंठ, मिरच, पीपल, रायविडङ्ग, सैंधानमक, बडीकटेरीके फल, सहिंजनेके बीज सिह्नालु और दन्तीके बीज इनके कल्क और गोमूत्रके साथ सरसोंके तेलको सिद्ध कर नास देवे तो इससे पूतिनस्यरोगका नाश होता है ॥ २६ ॥
चित्रकतैल ।
चित्रकचविकादीप्यकनिदिग्धिकाकरञ्जबीजलवणार्कैः ।
गोमूत्रयुतैः सिद्धं तैलं नासार्शासां शान्त्यै ॥ २७ ॥