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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1189 of 1416

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Page 1189

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११५७

सतौनेकी छाल, खस, परवल, नागरमोथा, हरड, कुटकी, मुलहठी, अमलतास और लालचन्दन इनका क्वाथ बनाकर पान करे तो मुखपाकरोग आराम होता है ॥ ७२ ॥

पटोलादि ।

पटोलशुण्ठीत्रिफलाविशालात्रायन्तितिक्ताद्विनिशामृतानाम् ।
पीतः कषायो मधुना निहन्ति मुखे स्थितश्चास्यगदानशेषान् ॥ ७३ ॥

पटोलपात, सोंठ, त्रिफला, इन्द्रायणकी जड, त्रायमाण, कुटकी, हल्दी, दारुहल्दी और गिलोय इनके क्वाथको मधुके साथ मिश्रितकर पान करनेसे अथवा मुखमें धारण करनेसे मुखके समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥ ७३ ॥

कालकचूर्ण ।

गृहधूमो यवक्षारः पाठा व्योषं रसाञ्जनम् ।
तेजोह्वा त्रिफला लौहं चित्रकं चेति चूर्णितम् ॥
सक्षौद्रं धारयेदेतद्गलरोगविनाशनम् ।
कालकं नाम तच्चूर्णं दन्तास्यगलरोगनुत् ॥ ७४ ॥

घरका धुआँ, जवाखार, पाठ, त्रिकुटा, रसौत, चव्य, त्रिफला, लोहा और चीता इनके समान भाग मिश्रित चूर्णको शहदमें मिलाकर मुखमें धारण करे तो यह कालकचूर्ण गलेके, दाँतोंके और मुखके सम्पूर्ण विकारोंको नष्ट कर देता है ॥

पीतकचूर्ण ।

मनःशिला यवक्षारो हरितालं ससैन्धवम् ।
दार्बीत्वक् चेति तच्चूर्णं माक्षिकेण समायुतम् ॥ ७५ ॥
मूर्च्छितं घृतयोगेन कण्ठरोगेषु धारयेत् ।
मुखरोगेषु च श्रेष्ठं पीतकं नामकीर्तितम् ॥ ७६ ॥

मैनासिल, जवाखार, हरिताल, सेंधानमक और दारुहल्दीकी छाल इनके चूर्णको समान भाग लेकर शहद और घृतमें मिलाकर मुखमें धारण करे । यह पीतकनामवाला चूर्ण कण्ठरोगमें और मुखरोगमें अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ७५ ॥ ७६ ॥

दशनसंस्कारचूर्ण ।

शुण्ठी हरीतकी मुस्ता खदिरं घनसारकम् ।
गुवाकभस्म मरिचं देवपुष्पं तथा त्वचम् ॥ ७७ ॥