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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1187 of 1416

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Page 1187

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११५५


वातात्सर्वसरं चूर्णैर्लवणैः प्रतिसारयेत् ।
तैलं वातहरैः सिद्धं हितं कवलनस्ययोः ॥ ६० ॥
वातज सर्वसर (मुखपाक) रोगमें सैंधेनमकका चूर्ण घिसे, वातनाशक औषधियोंके साथ तेलको सिद्ध कर नस्य देना, कवल धारण कराना हितकरहै ॥

पित्तात्मके सर्वसरे शुद्धकायस्य देहिनः ।
सर्वपित्तहरः कार्यो विधिर्मधुरशीतलः ॥ ६१ ॥
पित्तज सर्वसररोगमें वमन और विरेचनादिके द्वारा रोगीका शरीर शुद्ध कर सर्वप्रकारकी मधुर और शीतल औषधियोंसे पित्तनाशक चिकित्सा करे ॥ ६१ ॥

प्रतिसारणगण्डूषधूमं संशोधनानि च ।
कफात्मके सर्वसरे क्रमं कुर्यात्कफापहम् ॥ ६२ ॥
कफज सर्व रसमें कफनाशक औषधियोंके द्वारा घर्षण, गण्डूष, धूम, वमन और विरेचनादि सम्पूर्ण क्रियायें यथाक्रम करे ॥ ६२ ॥

मुखपाके शिरावेधः शिरःकायविरेचनम् ।
कार्यं च बहुधा नित्यं जातीपत्रस्य चर्वणम् ॥ ६३ ॥
मुखपाकरोगमें फस्त खुलवाना, नस्य देना और विरेचन कराना और वारम्वार चमेलीके पत्तोंको चाबना उपयोगी है ॥ ६३ ॥

जातीपत्रामृताद्राक्षापाठादार्वीफलत्रिकैः ।
क्वाथः क्षौद्रयुतः शीतो गण्डूषो मुखपाकनुत् ॥ ६४ ॥
चमेलीके पत्ते, गिलोय, दाख, पाठ, दारुहल्दी और त्रिफला इनके शीतल क्वाथमें शहद डालकर कुल्ले करनेसे मुखपाकरोग नष्ट होताहै ॥ ६४ ॥

पटोलनिम्बजम्ब्वारग्रमालतीनवपल्लवाः ।
पञ्चपल्लवजः श्रेष्ठः कषायो मुखधावने ॥ ६५ ॥
पटोलपत्र, नीमके पत्ते, जामुनके पत्ते, आम और चमेली इनके कोमल पत्ते समान भाग लेकर क्वाथ बनावे । इस क्वाथसे मुख धोना मुखपाकमें हितकरहै ॥

पञ्चवल्कलकषायो वा त्रिफला क्वाथ एव वा ।
मुखपाकेषु सक्षौद्रः प्रयोज्यो मुखधावने ॥ ६६ ॥
मुखपाकमें वड, गूलर, पीपल, पाखर और बेंत इनकी छालके क्वाथ अथवा हरड, बहेडा आमला इनके क्वाथमें शहद मिलाकर मुखधावन करना चाहिये ॥