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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1184 of 1416

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Page 1184

११५२ भैषज्यरत्नावली। [ मुखरोग-

तालुगत-मुखरोगकी चिकित्सा।

छित्त्वा घर्षेद्गलशुण्ठीं व्योषोग्राक्षौद्रसिन्धुजैः।
कुष्ठोषणवचासिन्धुकणापाठाप्लवैरपि॥
सक्षौद्रैर्भिषजा कार्यं गलशुण्ठ्याः प्रघर्षणम्॥ ४०॥

गलशुण्ठी (कण्ठशुण्ठी) रोगको शस्त्रसे काटकर सोंठ, मिरच, पीपल, वच और सैंधेनमकके चूर्णको शहदमें मिलाकर अथवा कुठ, कालीमिरच, वच, सेन्धानमक, पीपल, पाठ और नागरमोथा इनके समानभाग चूर्णको शहदमें मिश्रितकर गलशुण्डीपर घिसे॥ ४०॥

उपनासाव्यधो हन्ति गलशुण्ठ्या विशेषतः।
गलशुण्ठीहरं तद्वच्छेफालीमूलचर्वणम्॥ ४१॥

नासिकाके समीपकी चौथी शिराको छोडकर अन्य शिराको वेधे। अथवा निर्गुण्डीकी जडको चावे तो गलशुण्ठीरोग दूर होता है॥ ४१॥

वचामतिविषां पाठां रास्नां कटुकरोहिणीम्।
निःक्वाथ्य पिचूमर्दे च कवलं तत्र योजयेत्॥ ४२॥

वच, अतीस, पाठ, रास्ना, कुटकी और नीमकी छाल इनका क्वाथ बनाकर उसका कवल धारण करे॥ ४२॥

क्षारसिद्धेषु मुद्गेषु यूषश्चाप्यशने हितः।
तुण्डिकेर्यध्रुषे कूर्मसंघाते तालुपुप्पुटे॥
एष एव विधिः कार्यो विशेषः शस्त्रकर्मणि॥ ४३॥

तुण्डिकेरी, अध्रुव, कूर्मसंघात और तालुपुप्पुटरोगमें जवाखारआदिक्षारद्रव्योंके द्वारा सिद्ध किया हुआ मूँगका यूष भोजन करे। इन समस्तरोगोंमें गलशुण्ठी रोगके समान चिकित्सा करे और विशेषकर शस्त्रक्रिया करे॥ ४३॥

तालुपाके तु कर्त्तव्यं विधानं पित्तनाशनम्।
स्नेहस्वेदौ तालुशोषे विधिश्चानिलनाशनः॥ ४४॥

तालुपाकरोगमें पित्तनाशकचिकित्सा करनी चाहिये और तालुशोषरोगमें स्नेह तथा स्वेद प्रयोगकर वातनाशकक्रिया करनी चाहिये॥ ४४॥

कण्ठगत-मुखरोगकी चिकित्सा।

साध्यानां रोहिणीनां तु हितं शोणितमोक्षणम्।
छर्दनं धूमपानं च गण्डूषो नस्यकर्म च॥ ४५॥