भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ११४६ | भैषज्यरत्नावली । | [ मुखरोग- |
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दन्तगत-मुखरोगकी चिकित्सा ।
चलदन्तस्थिरकरं कुर्याद्वकुलचर्वणम् ।
आर्त्तगलदलक्वाथगण्डूषो दन्तचालनुत् ॥
दन्तचाले हितं श्रेष्ठं तिलोग्राचर्वणं सदा ॥ ६ ॥
जिसके दाँत हिलते हों तो वह मौलसिरीके फल चर्वण करे अथवा नीलीकटसरैयाके पत्तोंका क्वाथ बनाकर उसका गण्डूष धारण करे । इससे दाँतोंका हिलना बन्द होजाता है । दाँतोंके हिलनेपर तिल और वच इन दोनोंको एकत्र मिलाकर निरन्तर चर्वण करना हितकारी है ॥ ६ ॥
दन्तपुप्पुटके कार्यं तरुणे रक्तमोक्षणम् ।
सपञ्चलवणः क्षारः सक्षौद्रः प्रतिसारणम् ॥ ७ ॥
नवीन दन्तपुप्पुटरोगमें रक्तमोक्षण करावे, फिर पाँचों नमक और जवाखार इनको पीसकर शहदमें मिलाकर दन्तमार्जन करे ॥ ७ ॥
दन्तानां तोदहर्षे च वातघ्नाः कवला हिताः ॥
गरम तेल, घी और स्नेहयुक्त दशमूलका क्वाथ इनके द्वारा कवल धारण करनेसे दाँतोंकी पीडा और दन्तहर्षरोग दूर होता है ॥
माक्षिकं पिप्पली सर्पिर्मिश्रितं धारयेन्मुखे ।
दन्तशूलहरं प्रोक्तं प्रधानमिदमौषधम् ॥ ८ ॥
पीपलके चूर्णको ६ माशे लेकर एक तोले घी और दो तोले शहदमें मिलाकर मुखमें धारण करे । यह औषधि दन्तशूलको हरनेके लिये सर्वप्रधान है ॥ ८ ॥
विस्राविते दन्तवेष्टे व्रणं तु प्रतिसारयेत् ।
लोध्रपत्तङ्गमधुकलाक्षाचूर्णैर्मधूत्तरैः ॥
गण्डूषे क्षीरिणो योज्याः सक्षौद्रघृतशर्कराः ॥ ९ ॥
दन्तवेष्टरोगमें जोंक आदिके द्वारा रक्तमोक्षण कराकर लोध, लालचन्दन, मुलहठी और लाख इनको एकत्र पीसकर शहदमें मिलाकर व्रणस्थानपर लगावे और शहद, घृत एवं चीनी मिलाकर दूधवाले बड, गूलर आदि वृक्षोंके क्वाथद्वारा गण्डूष (कुल्ले) करे । इससे दन्तवेष्टरोगके व्रण अच्छे होते हैं ॥ ९ ॥
शौशिरे हतरक्ते तु लोध्रमुस्तरसाम्जनैः ।
सक्षौद्रैः शस्यते लेपो गण्डूषे क्षीरिणो हिताः ॥ १० ॥