भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १११३
मसूरैः सर्पिषा भृष्टैर्लिप्तमास्यं पयोऽन्वितैः ।
सप्तरात्राद्भवेत्सत्यं पुण्डरीकदलप्रभम् ॥ ४३ ॥
मसूरकी दालको घृतमें भूनकर और दूधमें पीसकर लेप करनेसे सात दिनमें मुख कमलपत्रकी कान्तियुक्त होजाता है। यह बिल्कुल सत्य है ॥ ४३ ॥
मातुलुङ्गजटा सर्पिः शिला गोशकृतो रसः ।
मुखकान्तिकरो लेपः पिडकातिलकालजित् ॥ ४४ ॥
बिजौरानींबूकी जड, घी, मैनसिल, गोबरका रस इन सबका लेप पिडका और तिलकालकरोगको जीतता है तथा मुखकी कान्तिको उज्ज्वल बनाता है ॥ ४४ ॥
नवनीतगुडक्षौद्रकोलमज्जप्रलेपनम् ।
व्यङ्गजिद्धरुणत्वग्वा छागक्षीरप्रपेषिता ॥ ४५ ॥
नैनीघी, गुड शहद और बेरकी गुठलीकी मींग इनको एकत्र पीसकर लेप करे अथवा बरनाकी छालको बकरीके दूधमें पीसकर लेप करे, यह लेप व्यङ्ग रोगको हरनेवाला है ॥ ४५ ॥
जातीफलकल्कलेपो नीलीव्यङ्गादिनाशनः ।
सायं च कटुतैलेनाभ्यङ्गो वक्त्रप्रसाधनः ॥ ४६ ॥
जायफलको पीसकर लेप करनेसे नाली और व्यङ्गादिरोग नाश होते हैं। सन्ध्यासमय सरसोंके तेलकी मुखपर मालिश करनेसे मुख उज्ज्वल और कान्तियुक्त होता है ॥ ४६ ॥
कालीयकोत्पलामयदधिसरबदरास्थिमध्यफलिनीभिः ।
लिप्तं भवति हि वदनं शशिप्रभं सप्तरात्रेण ॥ ४७ ॥
सुगन्धितकाष्ठ अथवा दारुहल्दी, कमल, कूट, दहीका तोड, बेरकी गुठलीकी मींग और फूलप्रियंगु इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर लेप करे तो सात दिनमें ही मुख चन्द्रमण्डलके समान शोभायमान होता है ॥ ४७ ॥
तुषरहितमसृणयवचूर्णसमयाष्टिमधुकरोध्रलेपेन ।
भवति मुखं परिनिर्जितचामीकरचारुसौभाग्यम् ॥ ४८ ॥
भूसीरहित जौका चूर्ण, मुलहठी और लोध इनको बराबर भाग लेकर एकत्र पीसकर लेप करनेसे मुखकी पिडिकायें दूर होकर मुख सुवर्णके समान अत्यन्त मनोहर और सुभग होजाता है ॥ ४८ ॥
रक्षोघ्नशर्वरीद्वयमञ्जिष्ठागैरिकाज्यबस्तपयः ।
सिद्धेन लिप्तमाननमुद्यद्विधुबिम्बवद् भाति ॥ ४९ ॥