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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 1157
चिकित्साभाषाटीकासहिता ।११३५

निष्पावमालुकं शाकं लवणं विषमाशनम् ।
कट्वम्लं वेगरोधं च मसूरीगदवांस्त्यजेत् ॥ ४० ॥
मसूरीरोगवाला मनुष्य मैथुन, स्वेदक्रिया, परिश्रम, तेल, भारी अन्नोंका सेवन, क्रोध, धूपका सेवन, दूषितजल, दूषितवायु, विरुद्धभोजन, सेमकी फली, आलु, शाक, नमक, विषम आहार, चरपरे और खट्टे द्रव्य एवं मलमूत्रादिके वेगकों रोकना इन सबको तत्काल त्यागदेवे ॥ ३९ ॥ ४० ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां मसूरिकाचिकित्सा ।

क्षुद्ररोगोंकी चिकित्सा ।

अजगल्लिका-चिकित्सा ।

तत्राजगल्लिकामामां जलौकाभिरुपाचरेत् ।
शुक्तिसौराष्ट्रिकाक्षारकल्कैश्चालेपयेन्मुहुः ॥ १॥
प्रथम अपक्वअजगल्लिकाके रुधिरको जोंक लगवाकर निकलवादे, पश्चात् सीप, सोरठदेशकी मिट्टी और जवाखार इनको एकत्र पीसकर बारबार लेपकरे ॥ १ ॥

नवीनकण्टकार्याश्च कण्टकैर्वेधमात्रतः ।
किमाश्चर्यं विपच्याशु प्रशाम्यन्त्यजगल्लिकाः ॥ २ ॥
नवीन कटेरीके काँटोंके द्वारा अजगल्लिकाको विद्धकरनेसे वह शीघ्र ही पच कर नष्ट होजाती है ॥ २ ॥

वृषमूलविशालाभ्यां लेपो हन्त्यजगल्लिकाम् ।
कठिनां क्षारयोगैश्च द्रावयेदजगल्लिकाम् ॥ ३ ॥
अड़ूसेकी जड और इन्द्रायणकी जडकी छाल इन दोनोंको एकत्र पीसकर लेप करनेसे अजगल्लिकारोग दूर होता है । यदि अजगल्लिका अत्यन्त कठिन हों तौ उसको क्षारादि औषधियोंके द्वारा नर्म करे ॥ ३ ॥

अनुशयी विवृतेन्द्रविद्धादि रोगोंकी चिकित्सा ।

श्लेष्मविद्रधिकल्पेन जयेदनुशयीं भिषक् ।
विवृतामिन्द्रविद्धां च गर्दभीं जालगर्दभम् ॥ ४ ॥