भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१११८ भैषज्यरत्नावली। [ मसूरिका-
विस्फोटरोगमें अपथ्य।
स्वेदं व्यवायं व्यायामं क्रोधं गुर्वन्नमातपम् ।
वमिवेगं पत्रशाकं प्रवातं स्वप्नं दिवा ॥ ९ ॥
ग्राम्यौदकानूपमांसं विरुद्धान्यशनानि च ।
तिलान्यवान्कुलत्थांश्च लवणाम्लकटूनि च ॥
विदाहि रूक्षमुष्णं च विस्फोटी परिवर्जयेत् ॥ १० ॥
पसीना निकलना, मैथुन, कसरत और क्रोधकरना, दुष्पाच्य अन्न, धूपका सेवन, वमनके वेगका रोध, पत्तोंवाले शाक, अत्यन्ततीक्ष्ण वायुका सेवन, दिनको सोना, ग्रामीण जीव, जलचर और अनूपदेशके प्राणियोंका मांस विरुद्ध खान पान, तिल, जौ, कुलथी, नमक, खट्टे और चरपरे, दाहकारी, रूखे और गरम ये सब पदार्थ विस्फोटवाला रोगी बहुत शीघ्र छोड़ देवे ॥ ९ ॥ १० ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां विस्फोटचिकित्सा।
मसूरिकाकी चिकित्सा।
चैत्रासितभूतदिने रक्तपताकान्विता स्नुहिर्भवेन ।
धवलितकलशे न्यस्ता पापरोगं दूरतो धत्ते ॥ १ ॥
चैत्रमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीके दिन शुभ्रवर्णवाले कलसेके ऊपर लालरंगके वस्त्रसे बनाई हुई थूहरके वृक्षकी शाखाकी पताका स्थापन करनेसे मसूरिका (वसन्त) रोग दूर भाग जाता है ॥ १ ॥
नारीणां वामपार्श्वस्थं नराणामपसव्यगम् ।
पापरोगमयं दूरात् शिवास्थि विनिवारयेत् ॥ २ ॥
स्त्रियोंकी बाईं पसलीमें और पुरुषोंके दाहिनी पसलीपर हरडका बीज (किसीके मतमें गीदड़की हड्डी) धारण करनेसे पापरोग समूह जाता रहता है ॥
ज्वरे जाते स्पृशेन्नाम्बु तिष्ठेन्निर्वातवेश्मनि ।
म्रक्षयेद्विजयाचूर्णैर्गात्रं वस्त्रेण बन्धयेत् ॥ ३ ॥
मसूरिकारोगमें ज्वर उत्पन्न होनेपर जलका स्पर्श न करे और वातरहित स्थानमें निवास करे। भाँगके चूर्णको शरीरमें मलकर वस्त्रसे ढकदेवे ॥ ३ ॥
रुद्राक्षं मरिचैर्युक्तं पीतं पर्युषिताम्भसा ।
त्र्यहात्पापरुजं हन्ति दृष्टं वारसहस्रशः ॥ ४ ॥