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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1145 of 1416

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Page 1145

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १११३

अम्लपित्तवाला रोगी नवीन अन्न स्वभावविरुद्ध और कफपित्तकारक द्रव्योंका भोजन वमनादिके वेगको रोकना तिल उडद कुलथी तेल भेंडका दूध काँजी नमकीन द्रव्य खट्टे चरपरे और गुरुपाकी द्रव्य दही और मद्य इन सब पदार्थोंको तत्काल छोडदेवे ॥ १३१ ॥ १३२ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां अम्लपित्तचिकित्सा ।


विसर्पकी चिकित्सा ।

विरेकवमनालेपसेचनासृग्विमोक्षणैः ।
उपाचरेद्यथादोषं विसर्पानविदाहिभिः ॥ १ ॥
विसर्परोगमें विरेचन, वमन, प्रलेप, सेचन, रक्तमोक्षण और जो दाहकारक न हों ऐसे उपचार दोषानुसार प्रयोग करने चाहिये ॥ १ ॥

पटोलपिचुमन्दाभ्यां पिप्पल्या मदनेन च ।
विसर्पे वमनं शस्तं तथैवेन्द्रयवैः सह ॥ २ ॥
पटोलपत्र और नीमकी छालके क्वाथके साथ पीपल और मैनफलका चूर्ण तथा इन्द्रजौका चूर्ण मिलाकर विसर्परोगमें वमन होनेके लिये देवे ॥ २ ॥

त्रिफलारससंयुक्तं सर्पिस्त्रिवृतया सह ।
प्रयोक्तव्यं विरेकार्थं विसर्पज्वरशान्तये ॥
रसमामलकानां वा घृतमिश्रं प्रदापयेत् ॥ ३ ॥
विसर्पज्वरकी निवृत्तिके लिये त्रिफलेके क्वाथमें घी और निसोतका चूर्ण डालकर विरेचनार्थ प्रदान करे अथवा आमलोंके स्वरसमें घी डालकर देवे तो इससे दस्त होकर विसर्परोग नष्ट होता है ॥ ३ ॥

मुस्तारिष्टपटोलानां क्वाथः सर्वविसर्पर्नुत् ।
धात्रीपटोलमुद्गानामथवा घृतसंप्लुतम् ॥ ४ ॥
नागरमोथा, नीमकी छाल और पटोलपातका क्वाथ अथवा आमले, परवल और मूँग इनका क्वाथ घृत मिलाकर सेवन करनेसे विसर्प रोग जाय ॥ ४ ॥

अमृतादि ।
अमृतवृषपटोलं मुस्तकं सप्तपर्णं खदिरमसितवेत्रं