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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1129 of 1416

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Page 1129

.चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०९७


हन्त्यम्लपित्तं विविधप्रकारं लीलाविलासो रसराज एषः ।
छर्दिं सशूलं हृदयस्य दाहं निवारयेदेव न संशयोऽत्र ॥
दुग्धं सकूष्माण्डरसं सधात्रीफलं समेतं ससितं भवेद्वा ॥ २६ ॥

पारा, गन्धक, अभ्रक, ताँवा और लोहा इनकी भस्मको एक एक तोला लेके फिर सबोंको एकत्र मिलाकर आमले और बहेडेके रस (अभावमें क्वाथ) में पृथक् पृथक् तीन दिनतक खरलकर कुछ थोडी देरतक भाँगरेके रसमें खरल करे पश्चात् इस रसको प्रतिदिन प्रातःकाल दो दो रत्तीप्रमाण सेवन करे और ऊपरसे दूध, पेडेका रस, आमलोंका रस अथवा चीनी पडाहुआ नारियलका जल पान करे । यह लीलाविलास सम्पूर्ण रसोंका राजा है । यह नानाप्रकारके अम्लपित्त, वमन, शूल और हृदयकी दाहादि रोगोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है इसमें कुछभी सन्देह नहीं है ॥ २५ ॥ २६ ॥

अम्लपित्तान्तकरस ।

मृतसूतार्कलोहानां तुल्यां पथ्यां विमर्दयेत् ।
माषमात्रं लिहेत्क्षौद्रैरम्लपित्तप्रशान्तये ॥ २७ ॥

रससिंदूर, ताँवा और लोहा ये प्रत्येक एक एक तोला और इनके बराबर भाग हरड लेकर सबोंको यथाविधि एकत्र मिलाकर पीसलेवे । पश्चात् इसको एक एक माशा प्रमाण शहदमें मिलाकर चाटनेसे अम्लपित्त शान्त होता है ॥ २७ ॥

भास्करामृताभ्र ।

वासामृताकेशराजः पर्पटी निम्बभृङ्गकैः ।
वृश्चीरं बृहती मुस्तं वाटचालकशतावरी ॥ २८ ॥
एषां सत्त्वैः पलोन्मानैर्मर्द्दितं विमलाभ्रकम् ।
सहस्रपुटितं तत्र शतावर्या रसं क्षिपेत् ॥
वारद्वादशकं दत्त्वा वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ २९ ॥

अड़ूसा, गिलोय, काला भाँगरा, पित्तपापडा, नीमकी छाल, भाँगरा, सफेद पुनर्नवा, बडी कटेरी, नागरमोथा, खिरेंटी और शतावर इनके चार चार तोले सत्त्वको निकाले और उससे एक हजार बार फूँकीहुई निर्मल अभ्रकको खरल करे । फिर उसमें बारह बार शतावरका रस डालकर उत्तम प्रकारसे खरल करके गोलियाँ बनालेवे ॥ २८ ॥ २९ ॥