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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1125 of 1416

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Page 1125

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०९३

आस्थापनं चिरोद्भूते देयं दोषाद्यपेक्षया ।
क्रियाशुद्धस्य शमनं ह्यनुबन्धव्यपेक्षया ॥
दोषसंसर्गजे कार्या भेषजाहारकल्पना ॥ २ ॥

पुराने अम्लपित्तरोगमें दोषोंको विचारकर निरूहणवस्ति प्रयोग करना उपयोगी है । अम्लपित्तमें मिलेहुए दोषोंका प्रकोप होनेपर उपर्युक्त विधिके अनुसार रोगीको शुद्धकर दोषोंको शमन करनेवाली औषध और आहारकी कल्पना करे ॥ २ ॥

ऊर्ध्वंगं वमनैर्धीमानधोगं रेचनैर्हरेत् ।
अम्लपित्ते तु वमनं पटोलारिष्टपत्रकैः ॥ ३ ॥
कारयेन्मदनक्षौद्रसिन्धुयुक्तैः कफोल्बणे ।
विरेचनं त्रिवृच्चूर्णै मधुधात्रीफलद्रवैः ॥ ४ ॥

ऊर्ध्वगत अम्लपित्तमें वमन और अधोगत अम्लपित्तमें विरेचन कराना श्रेष्ठ है, कफप्रधान अम्लपित्तरोगमें परवलके पत्ते, नीमके पत्ते, मैनफल, शहद, सैन्धानमक इनका क्वाथ पान कराकर रोगीको वमन करावे एवं आमलोंके क्वाथमें शहद और निसोतका चूर्ण डालकर रोगीको पान कराकर दस्त करावे ॥ ३ ॥ ४ ॥

तिक्तभूयिष्ठमाहारं पानं चापि प्रकल्पयेत् ।
यवगोधूमविकृतीतीक्ष्णसंस्कारवर्जिताः ॥
यथास्वं लाजसक्तून्वा सितामधुयुतान्पिबेत् ॥ ५ ॥

अम्लपित्तरोगमें कडवेरसवाले द्रव्योंके साथ आहार और पान मिश्रित करके देवे । एवं मिष्ट पदार्थोंके साथ जौ और गेहूँके बनाये हुए खाद्यपदार्थ देवे, किन्तु उनके साथ नमक, लालमिरच और खटाई आदि तीक्ष्णद्रव्य मिलाकर सेवन न करे । अम्लपित्तरोगी मिश्री और शहद मिलाकर खीलोंके सत्तुओंको यथेच्छरूपसें पान करे ॥ ५ ॥

निस्तुषयववृषधात्रीक्वाथस्त्रिसुगन्धिमधुयुतः पीतः ।
हन्त्यम्लपित्तमचिराद् यदि भुक्तं मुद्गयूषेण ॥ ६ ॥

भूसीरहित जौ, अडूसेके पत्ते और आमले इनके क्वाथमें दारचीनी, इलायची और तेजपात इनका चूर्ण एवं शहद मिलाकर पान करे और मूंगके यूषका पथ्य करे तो अम्लपित्तरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ ६ ॥