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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 1123

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०९१


समान अत्यन्त देदीप्यमान होजाता है। यह औषधि शीतपित्त, उदद्दं और कोठरोगोंको सात दिनमें ही नष्ट करदेता है। इसको हरिद्राखण्ड कहते हैं। यह हरिद्राखण्ड खुजलीरोगकी अत्युत्तम औषधि है ॥ ८–१२ ॥

बृहद्धरिद्राखण्ड ।

निशाचूर्णस्य कुडवं त्रिवृत्पलचतुष्टयम् ।
अभया तत्समा देया सार्द्धप्रस्थद्वयी सिता ॥ १३ ॥
दार्बी मुस्ता यमान्यौ द्वे चित्रकं कटुरोहिणीं ।
अजाजी पिप्पली शुण्ठी त्रिजातं कृमिकण्टकम् ॥ १४ ॥
अमृता वासकं कुष्ठं त्रिफला चव्यधान्यकम् ।
मृतलौहं मृताभ्रं च प्रत्येकं कोलसंमितम् ॥ १५ ॥
पचेन्मृद्वग्निना वैद्यो भाजने मृन्मये नवे ।
कर्षाद्धं च ततः खादेदुष्णतोयानुपानतः ॥ १६ ॥
शीतपित्तोदर्दकोठकण्डूपामाविचर्चिकाः ।
जीर्णज्वरकृमीन्पाण्डुशोथादींश्च विनाशयेत् ॥ १७ ॥

हल्दीका चूर्ण १६ तोले, निसोत १६ तोले, हरड १६ तोले, मिश्री १६० तोले, दारुहल्दी, नागरमोथा, अजवायन, अजमोद, चीता, कुटकी, कालाजीरा, पीपल, साँठ, दारचीनी, इलायची, तेजपात, वायविडङ्ग, गिलोय, अडूसा, कूठ, त्रिफला, चव्य, धनियाँ, लोहभस्म और अभ्रकभस्म ये प्रत्येक एकएक तोला लेवे । फिर सबोंको एकत्र कूटपीसकर यथाविधिसे मिलाकर मिट्टीके नये और उत्तमप्रकारसे दृढ पात्रमें पाक करे । प्रतिदिन प्रातःकाल इसमेंसे छः छः माशे लेकर मन्दोष्ण जलके साथ भक्षण करे तो यह बृहद्धरिद्राखण्डावलेह शीतपित्त ( पित्ती ), उदद्दं, कोठ, कण्डू, पामा, विचर्चिका, जीर्णज्वर, कृमिरोग, पाण्डु और शोथप्रभृति रोगोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है ॥

शीतपित्तोदर्दकोठरोगोंमें पथ्य ।

छर्दिर्विरेचनं लेपोऽसृङ्मोक्षो जीर्णशालयः ।
जाङ्गलैरामिषैर्मुद्गैः कुलत्थैर्वा कृता रसा ॥ १८ ॥
कर्कोटकं कारवेल्लं शिग्रुमूलकपोतिकाः ।
शालिञ्चशाकं वेत्राग्रं दाडिमं त्रिफला मधु ॥ १९ ॥