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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1115 of 1416

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Page 1115

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०८३

अण्डीके बीज, तुलसीके बीज, बापची, चकवड, कडवी तोरईके बीज, पीपल, ढेरांवृक्षके बीज, मैनसिल, हीराक्सीस, हरड, कूट और वायविडंग ये सब औषधियाँ समान भाग मिलित एक सेर लेकर एकत्र पीसकर कल्क बनावेवे। फिर यह कल्क एवं गोमूत्र, दहीका तोड, गौका दूध, बकरेका मूत्र और कडवा तेल ये प्रत्येक चार चार सेर, सबोंको एकत्र मिलाकर उत्तम प्रकार पकावे। श्वेतकुष्ठपर प्रथम खुजलाकर पश्चात् इस तेलको मर्दन करे तो श्वेतकुष्ठरोग समूल नष्ट होजाता है और त्वचाका वर्ण पूर्ववत् अत्यन्त सुन्दर हो जाता है ॥ २०६-२०८ ॥

आरग्वधाद्यतैल।

आरग्वधं धवं कुष्ठं हरितालंमनःशिला ।
रजनीद्वयसंयुक्तं पचेत्तैलं विधानवित् ॥
एतेनाभ्यञ्जनादेव क्षिप्रं श्वित्रं विनश्यति ॥ ९ ॥

अमलतासके बीज, धौवृक्षकी छाल, कूट, हरिताल, मैनशिल, हल्दी, दारुहल्दी इन औषधियोंके समान भाग मिश्रित १ सेर कल्कके द्वारा १ प्रस्थ तेलको यथा-विधि पकावे। इस तेलके मर्दन करनेसेही श्वेतकुष्ठ नष्ट होता है ॥ २०९ ॥

वासारुद्रतैल ।

त्रिफला निम्बभण्टाकी बृहत्यौ सपुनर्नवे ।
हरिद्रे वृषनिर्गुण्ड्यौ पटोलकनकाह्वयौ ॥ २१० ॥
हरितालं शिलाकुष्ठौ लाङ्गलीदाडिमाह्वयौ ।
अपामार्गो विषं चैव जयन्ती पूतिकट्फलौ ॥ ११ ॥
एषां कर्षद्वयैः कल्कैस्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।
चतुर्गुणे गुडूच्याश्च रसे वैद्यः समाहितः ॥ १२ ॥
चतुर्गुणं तु गोक्षीरं वृषपत्ररसं तथा ।
दत्त्वाऽवतारयेद्वैद्यो रुद्रमन्त्रं समाजपेत् ॥ १३ ॥

हरड, बहेडा, आमला, नीमकी छाल, मुसली, कटाई, कटेरी, श्वेतपुनर्नवा, लालपुनर्नवा, हल्दी, दारुहल्दी, अडूसा, निर्गुण्डी, परवल, धतूरेकी जड, हरिताल, मैनसिल, कूट, कालिहारी, अनार, चिरचिटा, मीठा विष जयन्ती, दुर्गन्धकरञ्ज और कायफल इन सबोंको दो दो तोले लेकर एकत्र कल्क बनावे। इस कल्कके साथ तिलका तेल १ प्रस्थ, गिलोयका रस ४ प्रस्थ, अडूसेके पत्तोंका रस ४ प्रस्थ