भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१०७८ भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग -
विचर्चिकां च पामां च वातरक्तं सुदारुणम् ।
गम्भीरं च तथोत्तानं नाशयेदस्य म्रक्षणात् ॥ ७९ ॥
कुष्ठराक्षसनामेदं सावर्ण्यकरणं परम् ।
अश्विभ्यां निर्मितं ह्येतल्लोकानुग्रहकांक्षया ॥ १८० ॥
पारा, गन्धक, कूठ, सतौना, चीता, सिन्दूर, लहसन, हरिताल, बापचीके बीज, अमलतासके बीज, ताँबेकी भस्म और मैनशिल इन सबोंको दो दो तोले और सरसोंका तेल ८ पल लेवे। सबोंको एकत्र मिलाकर सूर्यताप (धूप) में पकावे। यह तेल मर्दन करनेसे सर्वप्रकारके कोढ़, सफेदकोढ़, औदुम्बरकुष्ठ, कच्छू, कुष्ठ, मांसवृद्धि, भगन्दर, विचर्चिका, पामा, दारुण वातरक्त तथा गम्भीर और उत्तानवातरक्तप्रभृति विकारोंको लगाते ही नष्ट करता है और व्रणस्थानको त्वचाके वर्णकी समान बना देता है। इस कुष्ठराक्षस नामक तेलको अश्विनीकुमारोंने सांसारिकके लिये बनाया है ॥ ७६-१८० ॥
षड्बिन्दुतेल ।
सिन्दूरामृततालगैरिकहलाजाजीगदत्र्यूषणै-
र्हृत्पाषाणरसोनबाणदहनस्नुह्यर्कदुग्धैर्निशा ।
राजीगन्धकहिङ्गुभिः परिमितैः शुक्त्या पचेत्सार्षपं
तैलं प्रस्थमितं घृतस्य कुडवं पात्रं तथाऽर्काद्रसम् ॥
गोमूत्रं च तथा विनीय सकलं पूतं शृतं रोगिणे
दद्यात्कुष्ठविचर्चिकादिषु भिषङ् नाम्ना तु षड्बिन्दूकम्॥८१
सिन्दूर, मीठा विष, हरिताल, गेरू, कलिहारी, काला जीरा, कूठ, सोंठ, मिरच, पीपल, मैनसिल, लहसन, सरफोंका, चीता, थूहरका दूध, आकका दूध, हल्दी राई, गन्धक और हींग इन सबोंको चार चार तोले लेकर कल्क बनावे। फिर इस कल्कके साथ सरसोंका तेल ६४ तोले, घी १६ तोले, आकके पत्तोंके रस ८ सेर इन सबोंको अच्छेप्रकार मिलाकर तेलको पकावे। जब उत्तम प्रकार पककर शीतल होजाय तब छानकर इस षड्बिन्दुनामक तेलको रोगीके लिये सेवन करावे। इससे कुष्ठ और विचर्चिका कुष्ठरोगमें शीघ्र लाभ होता है ॥ ८१ ॥
उन्मत्ततैल ।
उन्मत्तकस्य बीजेन माणकक्षारवारिणा ।
कटुतैलं विपक्तव्यं शीघ्रं हन्ति विपादिकाम् ॥ ८२ ॥