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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 1100

१०६८ भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-

पडनेसे गलेहुए कान, अंगुलियाँ, नाक और गलितकुष्ठरोगी फिरसे इस प्रकार नव-यौवनयुक्त और सुन्दर शरीरवाला होजाता है, जिस प्रकार सूखा हुआ वृक्ष वर्षा-कालमें पानीके पडनेसे नवीन अंकुर युक्त होकर हराभरा होजाता है ॥ १५-१७ ॥

उष्ट्रान्मयूराञ्जयति स्वरेण बलेन नागस्तुरगो जवेन ।
रसायनस्यास्य नरःप्रसादाद्बृहस्पतेरप्यधिकःसुबुद्ध्या ॥ १८ ॥
ग्रन्थान्विशालान्पुनरुक्तिदोषान् गृह्णाति शीघ्रं न च नश्यते तु ।
कुर्वन्निमं कल्पमनल्पबुद्धिर्जीवेन्नरो वर्षशतानि पञ्च ॥
राजा ह्ययं सर्वरसायनानां चकार योगं भगवानगस्त्यः ॥ १९ ॥

उसका स्वर ऊँट और मोरके स्वरकी समान सुन्दर होजाता है। इस रसा-यनके प्रतापसे रोगी हाथीके समान बलवान्, घोडेके समान वेगवान् और बृहस्पतिसे भी अधिक बुद्धिमान् होजाता है तथा बडे बडे ग्रन्थोंके आशयोंको समझने और उनको कण्ठमें करनेकी शक्तिवाला होता है। इसके प्रभावसे मनुष्य ५०० वर्षतक जीता है। यह सब रसायनोंका राजा है। इस उत्तम कल्पवृक्षके समान फलदायक योगको श्रीभगवान् अगस्त्यजीने कल्पित किया है। इससे कुष्ठरोग अवश्य दूर होते हैं ॥ १८ ॥ १९ ॥

महाभल्लातकगुड ।

निम्बं गोपाऽरुणा कट्वी त्रायन्ती त्रिफला घनम् ।
पर्पटावल्गुजानन्ता वचा खदिरचन्दनम् ॥ २० ॥
पाठा शुण्ठी शठी भार्गी वासा भूनिम्बवत्सकम् ।
श्यामेन्द्रवारुणी मूर्वा विडङ्गेन्द्रविषानलम् ॥ २१ ॥
हस्तिकर्णा मृताऽर्द्रैका पटोलं रजनीद्वयम् ।
कणारग्वधसप्ताह्वकृष्णवेत्रोञ्चटाफलम् ॥ २२ ॥
भूकन्दं तृणपर्णं च जिङ्गी पद्माटमूषली ।
विष्वक्सेना च कैटर्यं शरपुङ्खा च कञ्चुकी ॥ २३ ॥
एषां द्विपलिकान्भागाञ्जलद्रोणे विपाचयेत् ।
अष्टभागावशिष्टं तु कषायमवतारयेत् ॥ २४ ॥