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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1097 of 1416

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Page 1097

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०६५

महाश्वास आदि रोगोंको शीघ्र नष्ट करती है। एवं जठराग्निको दीपन करनेवाली, हृदयको हितकारी और बल, वर्ण, वीर्य तथा आयुकी अत्यन्त वृद्धि करनेवाली है ॥ ९८-१०१ ॥

विवर्ज्य शाकाम्लमपि स्त्रियं च सेव्यो रसो जाङ्गलजीविकानाम् ।
शाल्योदनं षष्टिकमाज्यमुद्गक्षौद्रं गुडक्षीरमिह क्रियायाम् ॥ २ ॥
शालिं च गुर्वादिबृहत्करञ्चशिलाजतुक्षौद्रयुतं पयश्च ।
सर्पिर्युतान्भक्षयतो विहङ्गान्नप्रपूर्यते दुर्बलदेहधातुः ॥
कृष्णस्य पक्षस्य सिते तु पक्षे त्रिपञ्चरात्रेण यथा शशाङ्कः ॥ ३ ॥

इस औषधिको सेवन करते समय शाक, खटाई और स्त्रीप्रसङ्गको सर्वथा त्यागदेवे और जङ्गली जीवोंके मांसका रस, लवादि पक्षियोंका मांस, शालिचावलोंका और साठीके चावलोंका भात, मूंग, घी, शहद, गुड और दूध इनका भोजन करे । शहद मिलाहुआ और घी मिलाहुआ दूध पान करना हितकारी है। इससे दुर्बल और क्षीणधातुवाले मनुष्य अत्यन्त वीर्यवान् होते हैं। जिस प्रकार कृष्णपक्षमें तीनदिन और शुक्लपक्षमें पाँचदिन पूरा चन्द्रमा रहता है उसी प्रकार इसका सेवनकर्त्ता जन पूर्णचन्द्रकी समान पूर्णवीर्य और अत्यन्त कान्तिमान् होता है ॥ १०२ ॥ १०३ ॥

पाकलक्षण ।

वस्त्रे निष्पीडितं सूक्ष्मे स्थूलतन्तौ घने दृढे ।
समुद्रं जायते व्यक्तं न निःसरति सन्धिभिः ॥
न च शब्दायते वह्नौ तदा सिद्धिं विनिर्दिशेत् ॥ ४ ॥

पाकका लक्षण इस प्रकार जानना चाहिये तथा—घने बुने हुए और मजबूत महीन कपडेको मोटे डोरेसे अच्छे प्रकार बाँधे । जब वह मुद्राके समान हो जाय और सन्धियोंसे न निकले एवं अग्निमें शब्द न हो तब पाक सिद्धहुआ जानना चाहिये ॥ १०४ ॥

रसमाणिक्य ।

तालकं वंशपत्राख्यं कूष्माण्डसलिले क्षिपेत् ।
सप्तधा वा त्रिधा वापि दध्नाऽम्लेन तथैव च ॥ ५ ॥