भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१०६० भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-
स्थूलोदरः सिंहकृशोदरश्च सुश्लिष्टसन्धिर्मधुनोपयोगात् ।
समोपयोगादपि ये दशन्ति सर्पादयो यान्ति विनाशमाशु ॥
जीवेच्चिरं व्याधिजराविमुक्तः शुभे रतश्चन्द्रसमानकान्तिः ॥७१॥
यह अवलेह विचर्चिका, औदुम्बर, पुण्डरीक, कापाल, दद्रु, किटिभ, अलस आदि, शतारु, विस्फोट, विसर्प, खुजली, कुष्ठका प्रकोप, अनेकप्रकारके किलासकुष्ठ, भगन्दर, श्लीपद, वातरक्त, जडता, अन्धता, नासूर, शिरकी पीडा, सर्वप्रकारके प्रमेह, सर्वप्रकारके प्रदर, सर्वप्रकारके स्थावर और जंगम विषोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है । इस अवलेहको शहदमें मिलाकर चाटनेसे बहुत मोटे पेटवाले मनुष्य सिंहकी समान पतले पेटवाले होजाते हैं और उनकी सन्धियें एवं पुट्ठे अत्यन्त दृढ़ होजाते हैं। इसके सेवनकर्ता पुरुषको जो सर्पादि विषधर जन्तु काट खायँ तो वे सर्पादि तत्काल मरजाते हैं और वह पुरुष सम्पूर्ण रोग एवं बुढ़ापेके चंगुलसे छूटकर बहुत समयतक जीता है तथा चन्द्रमाकी समान अत्यन्त सुन्दर शरीरकी कान्ति होजाती है ॥ ६९-७१ ॥
श्वेतारि ।
शुद्धसूतं समं गन्धं त्रिफलां भृङ्गवागुजीम् ।
भल्लातकं तिलं कृष्णं निम्बबीजं समं समम् ॥ ७२ ॥
मर्दयेद्भृङ्गजद्रावैः शोष्यं पेष्यं पुनः पुनः ।
इत्थं कुर्यात्त्रिसप्ताहं रसः श्वेतारिको भवेत् ॥ ७३ ॥
मध्वाज्यैर्निष्कमात्रं तु खादेच्छ्वेतं विनाशयेत् ॥ ७४ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, हरड, बहेडा, आमला, भाँगरा, बापचीके बीज, भिलावे, कालेतिल और नीमकी निबौली इनको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर उस चूर्णको भाँगरेके रसमें भावना देवे और सुखालेवे । इस प्रकार २१ दिन तक करे । फिर खूब बारीक पीसकर चार चार माशेकी गोलियां बनालेवे । प्रतिदिन एक एक गोली शहद और घीमें मिलाकर सेवन करनेसे श्वेतकुष्ठ शीघ्र दूर होता है ॥ ७२-७४ ॥
तालकेश्वररस ।
कूष्माण्डत्रिफलातैलकन्याकाञ्जिकभावितम् ।
तालकं तुल्यगन्धं स्यादर्द्धपारदमर्दितम् ॥ ७५ ॥