भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१०५८ भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-
नाशं गच्छति वातरक्तमखिला नश्यन्ति रक्तामया
वीसर्पस्त्वचि शून्यता नयनजा रोगाः प्रशाम्यन्ति च५७॥
इस क्वाथको प्रतिदिन नियमानुसार सेवन करनेसे त्वचासम्बन्धी सर्वरोग, अष्टादश कुष्ठ, सम्पूर्ण वातरक्त तथा रक्तसम्बन्धी अन्यान्य विकार, विसर्प, त्वचाकी सुन्नी एवं नेत्रोंके सर्वप्रकारके रोग बहुत शीघ्र नष्ट होजाते हैं ॥ ५७ ॥
पञ्चनिम्ब १-२ ।
निम्बस्य पत्रं मूलानि सत्वक्पुष्पफलानि च ।
चूर्णितानि घृतक्षौद्रसंयुतानि दिने दिने ॥ ५८ ॥
लिह्यात्पिबेद्वा मूत्रेण संयुक्तान्युदकेन वा ।
मदिरामलतोयेन पयसा वा यथाबलम् ॥ ५९ ॥
भुञ्जीत घृतयूषाद्यैः शाल्यन्नं पयसापि वा ।
सर्वकुष्ठविसर्पार्शोनाडीदुष्टव्रणानपि ॥ ६० ॥
कामलां च गदान्हन्यात्तथा पित्तकफास्रजान् ।
संवत्सरप्रयोगेण सर्ववर्ज्यविवर्जितः ॥
जयत्येतत्पञ्चनिम्बं रसायनमनुत्तमम् ॥ ६१ ॥
१—नीमके पत्ते, जड, छाल, फूल, और फल इन सबोंको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको घी, शहद, गोमूत्र, जल, मद्य, आमलोंके क्वाथ अथवा दूधके साथ मिलाकर अपनी अग्निके बलानुसार प्रतिदिन नियमपूर्वक सेवन करे । इसको अविच्छिन्न रूपसे एक वर्षतक सेवन करनेसे सर्वप्रकारके कोढ, विसर्प, बवासीर, दुष्ट नाडीव्रण, कामला, पित्त-कफ और रुधिरके विकारोंसे उत्पन्न होनेवाले रोग एवं अन्यान्य विविधभाँतिके रोगसमूह नष्ट होते हैं । इसपर घृत, दुग्ध, मूँगका यूष और शालिचावलोंका भात पथ्यरूपसे खाना चाहिये तथा मछली, खटाई और शाकादि द्रव्य त्यागदेने चाहिये । यह पञ्चनिम्ब अत्युत्तम रसायन है ॥ ५८-६१ ॥
पुष्पकाले च पुष्पाणि फलकाले फलानि च ।
सञ्चूर्ण्य पिचुमर्दस्य त्वङ्मूलानि दलानि च ॥ ६२ ॥
द्विरंशानि समाहृत्य भागिकानि प्रकल्पयेत् ।
त्रिफला व्युषणं ब्राह्मी श्वदंष्ट्रारुष्कराभ्रिकाः ॥ ६३ ॥