Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1088 of 1416

Read in context
Page 1088

१०५६ भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-

अपनी अग्निके बलानुसार प्रतिदिन गिलोयके रसको पान करे। उसके पचनेपर घृतामिश्रित मूँगका यूष और भातका भोजन करे तो इससे अत्यन्त दुर्गन्धि युक्त कुष्ठ भी दूर होकर शरीर विशेषकान्तिमान् होजाता है ॥ ४५ ॥ ४६ ॥

यः खादेदभयारिष्टमरिष्टामलकानि वा ।
स जयेत्सर्वकुष्ठानि मासादूर्द्धं न संशयः ॥ ४७ ॥

जो हरडके चूर्ण और नीमके पत्तोंके चूर्णको अथवा नीमके पत्ते और आमलोंके चूर्णको एकत्र पीसकर यथानियम एक महीनेतक सेवन करे तो वह सर्वप्रकारके कुष्ठरोगोंसे शीघ्र मुक्त होता है। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ४७ ॥

आरग्वधादि ।

आरग्वधं धातकिकर्णिकारधवार्जुनैः सर्जककिंशुकानाम् ।
कदम्बनिम्बकुटजाटरूषाः खदिरेण युक्ताश्च तथैव मूर्वा ॥ ४८ ॥
मूलानि चैषामुपहृत्य सम्यगष्टावशेषः क्वथितः कषायः ।
घृतेन तुल्यं प्रतिमानमस्य निहन्ति सर्वाणि शरीरजानि ॥
कुष्ठानि सर्वाणि विसर्पदद्रुविचर्चिका हन्ति नरस्य शीघ्रम् ॥ ४९ ॥

अमलतास, धायके फूल, कर्णिकार पुष्पविशेष, धौंवृक्ष, अर्जुन, सालवृक्ष, ढाक, कदम, नीम, कुडा, अडूसा, खैर, मूर्वा इन सब वृक्षोंकी जडको समान भाग लेकर अठगुने जलमें अच्छे प्रकार पकावे। जब पकते पकते आठमांश जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे। फिर इस क्वाथमें समान भाग घृत मिलाकर पान करनेसे विसर्प, दद्रु और विचार्चिका आदि सर्व प्रकारके कुष्ठरोग तत्काल नष्ट होते हैं ॥ ४८ ॥ ४९ ॥

लघुमञ्जिष्ठादि ।

मञ्जिष्ठात्रिफलातिक्तावचादारुनिशाभयाः ।
निम्बश्चैव कृतः क्वाथः सर्वकुष्ठं विनाशयेत् ॥ ५० ॥
वातरक्तं तथा कण्डुं पामानं रक्तमण्डलम् ।
दद्रुवीसर्पविस्फोटं पानाभ्यासेन नाशयेत् ॥ ५१ ॥

मंजीठ, त्रिफला, कुटकी, वच, दारुहल्दी, हरड और नीमकी छाल इनका क्वाथ बनाकर सेवन करनेसे समस्त कुष्ठ, वातरक्त, कण्डू, पामा, रक्तमण्डल, दाद, विसर्प और विस्फोट आदि विकार दूर होते हैं ॥ ५० ॥ ५१ ॥