भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| १०५२ | भैषज्यरत्नावली । | [ कुष्ठरोग- |
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विषवरुणहरिद्राचित्रकागारधूमं
ह्यनलमरिचदूर्वाः क्षीरमर्कस्नुहीभ्याम् ।
दहति पतितमात्रं कुष्ठजातीरशेषाः
कुलिशमिव सुरोषाच्छक्रहस्ताद्विमुक्तम् ॥ २३ ॥
विष, वरनाकी छाल, हल्दी, चीता, गृहधूम, भिलावे, कालीमिरच, दूब इन सबोंको एकत्र आकके दूध और थूहरके दूधमें अच्छेप्रकार खरल करके लेप करें तो सर्वप्रकारके कुष्ठरोग इसके लगातेही इसप्रकार नष्ट होजाते हैं जिस प्रकार अत्यन्तक्रोधसे छोडा हुआ इन्द्रका वज्र वृक्षसमूहको नष्ट करदेता है ॥ २३ ॥
भल्लातकं द्वीपिसुधार्कमूलं गुञ्जाफलं त्र्यूषणशङ्खचूर्णम् ।
तुत्थं सकुष्ठं लवणानि पञ्च क्षारद्वयं लाङ्गलिकां च पक्त्वा २४
स्नुह्यर्कदुग्धे घनमायसस्थं शलाकया तद्विदधीत लेपम् ।
कुष्ठे किलासे तिलकालके चाप्यशेषदुर्नामसु चर्मकीले ॥ २५ ॥
भिलावे, चीता, थूहरकी जड, आककी जड, घोंटली, सोंठ, मिरच, पीपल, शंखचूर्ण, तूतिया, कूट, पाँचों नमक, जवाखार, सज्जी और कलिहारी इन औषधियोंके समान भाग चूर्णको थूहरके दूध और आकके दूधके साथ लोहेके स्वच्छ पात्रमें पकाकर उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे । इस मरहमको किलास, तिलकालक और चर्मकीलनामक कुष्ठ एवं बवासीररोगमें सलाई द्वारा लगानेसे उक्त रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥
स्नुक्काण्डे सुषिरे दग्ध्वा गृहधूमं ससैन्धवम् ।
अन्तर्धूमं तैलयुक्तं लेपाद्धन्ति विचर्चिकाम् ॥ २६ ॥
थूहरके मुद्देमें घरका धुआँ और सैंधानमक भरकर पुटपाककी रीतिसे अग्निमें भस्म करे । फिर उसको सरसोंके तेलमें मिलाकर लेप करनेसे विचर्चिकानामक कुष्ठ दूर होता है ॥ २६ ॥
स्नुक्काण्डे सर्षपात्कल्कः करीषानलपाचितः ।
लेपाद्विचर्चिकां हन्ति रागवेग इव त्रपाम् ॥ २७ ॥
थूहरकी शाखामें सरसोंका कल्क भरकर आरने उपलोंकी अग्निमें पकावें । पश्चात् उसको सरसोंके तेलमें मिलाकर लेप करनेसे विचर्चिकारोग इस प्रकार नष्ट होता है जिस प्रकार प्रीतिका वेग लज्जाको दूर करदेता है ॥ २७ ॥