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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1075 of 1416

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Page 1075

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०४३


मर्द्दयेत्तुलसीतोयैरेतेषां द्विगुणं शुभम् ।
दद्यात्खदिरसत्त्वं च वटिका चणकप्रभा ॥ ५६ ॥

पारा २ रत्ती और अफीम १२ रत्ती लेकर दोनोंको लोहेके बर्त्तनमें नीमके डंडेसे तुलसीका रस डालकर घोटे । जब पारा मूर्च्छित होजाय तब उसमें दो रत्ती सिंगरफ मिलाकर तुलसीके ही रससे दुबारा खरल करे । फिर जावित्री, जायफल, खुरासानी अजवायन और अकरकरा ये प्रत्येक बत्तीस बत्तीस रत्ती और सबोंसे दुगुना उत्तम प्रकारका खैरसार डालकर तुलसीके रसमें यथाविधि खरल करके चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे ॥ ५३-५६ ॥

सायं द्वे प्रयोज्ये च लवणाम्लं च वर्जयेत् ।
गलत्कुष्ठं तथा स्फोटान्दुष्टान् गर्दभिकामपि ॥ ५७ ॥
ये स्युर्व्रणा नृणामन्ये उपदंशपुरःसराः ।
तान् सर्वान्नाशयत्याशु सिद्धोऽयं रसशेखरः ॥ ५८ ॥

इसमेंसे प्रतिदिन सायङ्कालमें दो दो गोली खाय; नमक और खटाईका त्याग करे, यह रसशेखरनामक सिद्धरस गलत्कुष्ठ, दुष्ट स्फोटक, गर्दभिका, उपदंशकें व्रण और अन्य सर्वप्रकारके व्रणोंको तत्काल नाश करता है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥

करञ्जाद्यघृत ।

करञ्जनिम्बार्जुनशालजम्बूवटादिभिः कल्ककषायसिद्धम् ।
सर्पिर्निहन्यादुपदंशदोषं सदाहपाकं स्रुतिरागयुक्तम् ॥ ५९ ॥

करञ्जकी जड, नीम, अर्जुन, शालवृक्ष, जामुन, बड, गूलर, पीपल, पिलखन और बेंत इन सबोंकी छालके कल्क और क्वाथके द्वारा सिद्ध किये हुए घृतको सेवन करनेसे दाह, पाक और राधका स्राव होना आदि दोषोंसहित उपदंशरोग नष्ट होता है ॥ ५९ ॥

भूनिम्बाद्यघृत ।

भूनिम्बनिम्बत्रिफलापटोलकरञ्जजातीखदिरासनानाम् ।
सतोयकल्कैर्घृतमाशु पक्वं सर्वोपवंशापहरं प्रदिष्टम् ॥ ६० ॥

चिरायता, नीम, त्रिफला, परवल, करंजुआ, जावित्री, खैर और आसना इनके क्वाथ और कल्कके साथ विधिपूर्वक घृतको पकावे । यह घृत नियमानुसार सेवन करनेपर सर्वप्रकारके उपदंशों ( आतशक ) को बहुत शीघ्र हरता है ॥ ६० ॥