भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०३९
शुद्ध किया हुआ पारा १०० रत्ती और शुद्ध खाँड ३०० रत्ती दोनोंको लोहेकें पात्रमें एकत्रकर नीमके डंडेसे एक प्रहरतक अच्छे प्रकार घोटे। फिर उसमें १०० रत्ती सफेद खैरका चूर्ण डालकर घोटे। जब घुटते घुटते कज्जलकी समान बारीक होजाय तब उसकी बीस गोलियाँ बनाकर गेहूंकें आटेमें रखदेवे। जब शरीरमें उपदंशके विषद्वारा सब फुन्सियाँ निकलीहुई मालूम हों तब प्रथम भैरवदेवको पुजकर और उनके लिये बलि देकर तथा योगिनी और दुर्गाका विधिपूर्वक पूजन करके पश्चात् उक्तगोलियोंको सुवैद्य यत्नके साथ प्रयोग करे। तीन दिनतक नित्य तीन तीन गोली देवे और चौथे दिनसे एक एक गोली देवे। इस प्रकार १४ दिन तक इन गोलियोंको सेवन करानेसे रोगी शीघ्रही आरोग्य होता है। इसपर खाँडके साथ थोडा घृत मिलाकर अधपका अन्न और सुगन्धियुक्तद्रव्योंका पथ्य देवे। जब इच्छा हो तब उठे बैठे और एकबार भोजन करे। शितल जलपान और शीतल जलका स्पर्शतक कदापि नहीं करना चाहिये। यदि अधिक तृषा मालूम हो तो ईख और अनारका रस पान करे। शौचके समय उष्णजलसे शुद्धि करे और तत्काल सूखे अँगोछेसे पोंछडाले। शितलवायु, धूप और अग्नि इनके सम्पर्कको दूर हीसे त्याग देवे ॥ ३० ॥
मेघागमे च शीते वा कार्यमेतद्विजानता ।
मुखरोगे तु सञ्जाते मुखरोगहरी क्रिया ॥ ३१ ॥
श्रमोध्वभाराध्ययनस्वप्नालस्यं विवर्जयेत् ।
ताम्बूलं भक्षयेन्नित्यं कर्पूरादिसुवासितम् ॥ ३२ ॥
क्रिया श्लेष्महरी युक्ता वातपित्ताविरोधिनी ।
लवणं वर्जयेदम्लं दिवानिद्रां तथैव च ॥ ३३ ॥
रात्रौ जागरणं चैव स्त्रीमुखालोकनं तथा ।
सप्ताहद्वयमुत्क्रम्य स्नानमुष्णाम्बुना चरेत् ॥ ३४ ॥
पथ्यं कुर्याद्धितमिदं जाङ्गलानां रसादिभिः ।
व्यायामाद्यं वर्जनीयं यावन्न प्रकृतिर्भवेत् ॥ ३५ ॥
वर्षा होनेपर अथवा शीतकालमें उपर्युक्त औषधि और धूपादि वस्तुओंको विधिपूर्वक सेवन करे। इस औषधिके सेवन करनेसे यदि मुख पकजाय तो मुखरोगको हरनेवाली चिकित्सा करना श्रेष्ठ है। उपदंशरोगी परिश्रम करना, मार्गमें चलना, बोझ उठाना, पढना, दिनमें सोना और आलस्य इनको त्याग देवे। एवं कपूरादि सुगन्धिवाले द्रव्योंसे सुवासित ताम्बूलको प्रतिदिन भक्षण करे। इस औषधिको