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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 1066

१०३४ भैषज्यरत्नावली । [ उपदंश-

सर्वेऽपि शालयो मुद्गा विलेपी जाङ्गलोरसः ।
पटोलं शिग्रुवेत्राग्रं पत्तूरो बालमूलकम् ॥ ३४ ॥
तिलसर्षपयोस्तैलं तिक्तवर्गो घृतं मधु ।
एतत्पथ्यं यथादोषं नरैः सेव्यं भगन्दरे ॥ ३५ ॥

भगन्दररोगकी अपक्व (कच्ची) अवस्थामें संशोधन, औषधियोंका लेप, लंघन और रुधिरका निकलवाना आदि कर्म हितकर हैं। और भगन्दरके पकजानेपर शस्त्रक्रिया, अग्निदग्ध एवं क्षारादिकर्म विधिपूर्वक करे। पक्व और अपक्व दोनों अवस्थाओंमें शालिधानके चावल, मूंग, विलेपी, जंगली पशु पक्षियोंका मांलरस, परवल, सहिंजना, बेंतकी कोंपल, शान्तिशाक, कच्चीमूली, तिल और सरसोंका तेल, तिक्तवर्ग, घृत और शहद इन सब पथ्य वस्तुओंको दोषानुसार सेवन करना चाहिये ॥ ३३-३५ ॥

भगन्दररोगमें अपथ्य ।

विरुद्धान्यन्नपानानि विषमाशनमातपम् ।
व्यायामं मैथुनं युद्धं पृष्ठयानं गुरूणि च ॥
संवत्सरं परिहरेदपि रूढव्रणो नरः ॥ ३६ ॥

स्वभावविरुद्ध अन्नपान और विषम भोजन, धूपका सेवन, कसरत, मैथुन, युद्ध, घोडे, ऊँट, हाथी आदिकी सवारी करना, बोझ उठाना और गुरुपाकी द्रव्योंका सेवन इन सबोंको भगन्दर रोगी व्रणके भरजानेपर भी एक वर्षतक सेवन नहीं करे ॥ ३६ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां भगन्दररोगकी चिकित्सा ।


उपदंशकी चिकित्सा ।

स्निग्धस्विन्नशरीरस्य ध्वजमध्ये शिराव्यधः ।
जलौकापातनं वा स्यादूर्ध्वाधः शोधनं तथा ॥ १ ॥
सद्यो निर्जितदोषस्य रुक्शोथावुपशाम्यतः ।
पाको रक्ष्यः प्रयत्नेन शिश्नक्षयकरो हि सः ॥ २ ॥

उपदंश (गरमी) रोगमें प्रथम रोगीको स्निग्ध द्रव्य पान कराकर स्वेदित करे। पश्चात् लिंगकी बीचकी शिराको वेधे अथवा जोंक लगवाकर रक्तमोक्षण