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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 1064

१०३२ भैषज्यरत्नावली । [ भगन्दर-

नमक, जवाखार, सज्जी, सेंधानमक और गजपीपल इन सम्पूर्ण औषधियोंका चूर्ण एक एक तोला और समस्त चूर्णसे दुगुनी गूगल लेवे। फिर सबोंको एकत्र उत्तम प्रकार खरल करके बेरकी बराबर गोलियाँ तैयार करलेवे। प्रतिदिन प्रातःकाल एक गोली मधुके साथ सेवन करे ॥ २१-२३ ॥

कासं श्वासं तथा शोथमर्शांसि च भगन्दरम् ।
हृच्छूलं पार्श्वशूलं च कुक्षिवस्तिगुदे रुजम् ॥ २४ ॥
अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रं च अन्त्रवृद्धिं तथा कृमिम् ।
चिरज्वरोपसृष्टानां क्षयोपहतचेतसाम् ॥ २५ ॥
आनाहं च तथोन्मादं कुष्ठानि चोदराणि च ।
नाडीं दुष्टव्रणान्सर्वान् प्रमेहं श्लीपदं तथा ॥
सप्तविंशतिको हन्ति सर्वरोगनिषूदनः ॥ २६ ॥

यह सप्तविंशतिकनामक गूगल खाँसी, श्वास, सूजन, बवासीर, भगन्दर, हृदयका शूल, पसलीका शूल, कुक्षि, वस्ति और गुदाके रोग, पथरी, मूत्रकृच्छ्र, अन्त्रवृद्धि, कृमिरोग एवं बहुत पुराने ज्वर, क्षयसे पीडित मनुष्योंके आनाह, उन्माद, कुष्ठ, उदररोग, नाडीव्रण, दुष्टव्रण, प्रमेह, श्लीपद तथा अन्यान्य सर्वप्रकारके विकारोंको तत्काल नष्ट करता है ॥ २४-२६ ॥

विष्यन्दनतैल ।

चित्रकार्कत्रिवृत्पाठे मलपूहयमारकौ ।
सुधां वचां लाङ्गलिकीं हरितालं सुवर्चिकाम् ॥
ज्योतिष्मतीं च संहृत्य तैलं धीरो विपाचयेत् ॥ २७ ॥

चीता, आक, निसोत इनकी जड, पाठ, गूलरकी जड, कनेरकी जड, थूहरकी जड, बच, कालिहारी, हरताल, सज्जी और मालकाङ्गनी इन सबोंको समान भाग लेकर कल्क बनावे और इसी कल्कके द्वारा चौगुने जलमें यथाविधि तिलके तेलकों सिद्ध करे ॥ २७ ॥

एतद्विष्यन्दनं नाम तैलं दद्याद्भगन्दरे ।
शोधनं रोपणं चैव सवर्णकरणं परम् ॥ २८ ॥

इस विष्यन्दननामवाले तेलको भगन्दर रोगमें व्यवहार करनेसे व्रण शुद्ध होकर शीघ्र भर जाता है और त्वचाका वर्ण अत्युत्तम होजाता है ॥ २८ ॥