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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 1054

१०२२ भैषज्यरत्नावली। [ भग्न-


राजार्हमेतत्कर्त्तव्यं राज्ञामेव विचक्षणैः ।
तिलचूर्णसमं त्वत्र मिलितं चूर्णमिष्यते ॥ २७ ॥

यह तेल अस्थिभग्नवाले रोगियोंको सर्वदा पथ्य है। इसको सर्व प्रकारके कर्म्मोंमें प्रयोग करना चाहिये तथा आक्षेपकवात, पक्षवात, तालुशोष, अर्दितवात, मन्या-स्तम्भ, शिरोरोग, कर्णशूल, हनुग्रह, बधिरता, तिमिररोग और अत्यधिक स्त्रीप्र-सङ्गकरनेसे उत्पन्न हुई क्षीणतामें यह तेल विशेष हितकारी है। पान, अभ्यङ्ग, नस्य, वस्तिकर्म्म और भोजनमें इसको सेवन करे। इसके मर्दनसे, कन्धे और छातीकी वृद्धि होती है, मुख कमलकी समान कान्तिमान् और सुगन्धित श्वासयुक्त होजाता है। यह गन्धतेल सर्व प्रकारके वातविकारोंको नष्ट करता है। यह तेल राजाओंके योग्य है, अतः प्रतिभाशाली वैद्य इसको राजाओंके लिये ही बनावे। इसमें तिलोंके चूर्णके बराबर भाग सब चूर्ण लेने चाहिये ॥ २३-२७ ॥

भग्नरोगमें पथ्य ।

शीताम्बुसेचनं पंकप्रदेहो बन्धनक्रिया ।
शालिप्रियङ्गुगोधूमा यूषो मुद्गसतीनयोः ॥ २८ ॥
नवनीतं घृतं क्षीरं तैलं माषरसो मधु ।
पटोलं लशुनं शिग्रुः पत्तूरो बालमूलकम् ॥ २९ ॥
द्राक्षा धात्री वज्रवल्ली लाक्षा पञ्चापि बृंहणम् ।
तत्सर्वं भिषजा नित्यं देयं भग्नाय जानता ॥ ३० ॥

शितल जल छिडकना, कींचका लेप, पट्टी बाँधना, शालिधानोंके चावल, मालकांगनी और गेहूँका भोजन, मूँग और मटरका यूष, नैनी घी, दूध, तेल, उडदोंका यूष, शहद, परवल, लहसन, सहिंजना, शान्तिशाक, कच्ची मूली, दाख, आँवले, हडसंहारिवेल, लाख और पुष्टिकर सब द्रव्योंको सुयोग्य वैद्य भग्नअस्थि वाले रोगीके लिये प्रतिदिन विचारपूर्वक देवे। ये सब उक्तरोगमें विशेष हितप्रद हैं ॥ २८-३० ॥

भग्नरोगमें अपथ्य ।

लवणं कटुकक्षारमम्लं मैथुनमातपम् ।
व्यायामं च न सेवेत भग्नो रूक्षान्नमेव च ॥ ३१ ॥

भग्नास्थिवाला रोगी नमक, कडवे, खारी और खट्टे रसवाले पदार्थ, स्त्रीसहवास, धूपका सेवन, कसरत एवं रूखेअन्नोंके भोजनको तत्काल त्याग देवे ॥ ३१ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां भग्नचिकित्सा ।