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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1045 of 1416

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Page 1045

चिकित्सा ] भाषाटीकासहितं । १०१३


व्रणरोगमें पथ्य ।

यवषष्टिकगोधूमा जाङ्गला मृगपक्षिणः ।
विलेपी लाजमण्डश्च कटुतैलं घृतं मधु ॥ ५४ ॥
तिलं मसूरतुवरीमुद्गयूषाश्च शर्करा ।
आषाढफलवार्त्ताकुकर्कोटकपटोलकम् ॥ ५५ ॥
कारवेल्लं निम्बपत्रं वेत्राग्रं बालमूलकम् ।
सुनिषण्णकशालिञ्चतण्डुलीयवास्तुकम् ॥ ५६ ॥
त्रिफला पनसं मोचं दाडिमं कटुकीफलम् ।
जीवन्ती सैन्धवं द्राक्षा स्वादुतिक्तकषायकः ॥ ५७ ॥
समस्तमेतदन्नं तु स्निग्धमुष्णं द्रवोत्तरम् ।
एषणं शमनं दाहः स्वेदनं बन्धनक्रिया ॥ ५८ ॥
व्रणावचूर्णनं लेपो धूपनं पत्रधारणम् ।
उशीरबालव्यजनं चन्दनं तिललेपनम् ॥ ५९ ॥
एतत्पथ्यं नरैः सेव्यं यथावस्थं यथामलम् ।
व्रणशोथे व्रणे सद्योव्रणे नाडीव्रणेऽपि च ॥ ६० ॥

व्रणके शोथ, व्रण, सद्योव्रण और नाडीव्रणमें-जौ, साठीके चावल, गेहूँ, जङ्गली पशुपक्षियोंका मांस, विलेपी, खोलोंका मांड, सरसोंका तेल, घी, शहद, तिल, मसूर, अरहर और मूँगका यूष इनका आहार, खाँड, ढाकके बीज, बैंगन, ककोडे, परवल, करेला, नीमके पत्ते, बेंतकी कोपल, कच्चीमूली, शिरिआरीशाक, शालिञ्चशाक, चौलाईशाक, बथुआ, त्रिफला, कटहल, केलेका मोचा, अनार, कुटकी, जीवन्ती, सेंधानमक, दाख, मधुर, तीखे और कसैले स्वादवाले पदार्थ, स्निग्ध, गरम और पतले बने अन्न, एषण (लोहेकी सलाईसे नाडीगति देखना), शमनकारक औषधि, व्रण-स्थानको आगसे दग्ध, स्वेदप्रदान, बन्धनक्रिया (व्रणपर वायु न लगे इस प्रकार बाँधना), व्रणपर ओषधियोंका चूर्ण, लेप, धूप और पत्तोंका लगाना, नवीन खसका बनाहुआ चँवर डुलाना, लाल चन्दन और तिलोंको पीसकर लेप करना ये सब हितकर पदार्थ अवस्था तथा दोषानुसार मनुष्योंको व्रणशोथ, व्रणरोग, सद्योव्रण और नाडीव्रणादि (नासूर) रोगोंमें सेवन करने चाहिये ॥ ५४–६० ॥