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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1040 of 1416

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Page 1040
१००८भैषज्यरत्नावली ।[ व्रणशोथ-

निर्वापणं घृतं क्षौद्रं तैलं मधुकचन्दनम् ।
लेपनं शोथरुग्दाहरक्तं निर्वापयेद्द्रणात् ॥ २६ ॥

घी, शहद, तेल, मुलहठी और चन्दन इन सबोंको एकत्र मिश्रणकर व्रणमें भरनेसे सूजन, पीडा, दाह और दूषितरक्त तत्काल नष्ट होजाता है ॥ २६ ॥

करञ्जारिष्टनिर्गुण्डीरसो हन्याद् व्रणक्रिमीन् ।
करञ्ज, नीमके पत्ते, निर्गुंडी इनके रसका लेप करे तो व्रणके कृमि नष्ट होय ॥

सप्ताङ्ग-गुग्गुलु ।

विडङ्गत्रिफलाव्योषचूर्णं गुग्गुलुना समम् ।
सर्पिषा वटिकां कृत्वा खादेद्वा हितभोजनः ॥
दुष्टव्रणापचीमेहकुष्ठनाडीविशोधनम् ॥ २७ ॥

वायविडङ्ग, त्रिफला, सोंठ, मिरच और पीपल इनका चूर्ण एक एक तोला और शुद्ध गूगल ७ तोले लेवे। फिर सबोंको एकत्र घृतमें खरल करके गोलियाँ बनालेवे। प्रतिदिन नियमानुसार इस औषधिका सेवन करे और इसपर हितकारी भोजन करे तो दुष्टव्रण, अपची, प्रमेह, कुष्ठ और नाडीव्रणादि सब विकार नष्ट होते हैं ॥ २७ ॥

जात्याद्यघृत और तैल ।

जातीनिम्बपटोलपत्रकटुकादार्बीनिशाशारिवा-
मञ्जिष्ठाभयसिक्थतुत्थमधुकैर्नक्ताह्वबीजैः समैः ।
सर्पिः सिद्धमनेन सूक्ष्मवदना मर्माश्रिताः स्राविणो
गम्भीराः सरुजो व्रणाः संगर्तिकाः शुष्यन्ति रोहन्ति च २८
“ एवं तैलम् प ”

चमेली और नीमके पत्ते, परवल, तेजपात, कुटकी, दारुहल्दी, हल्दी, सारिवा, मंजीठ, हरड, मोम, नीलाथोथा, मुलहठी और करञ्जके बीज इनको समान भाग लेकर पीसलेवे। इस कल्कद्वारा एक सेर गोघृत अथवा तिलके तेलको ८ सेर जलमें मन्द मन्द अग्निसे पकावे। फिर उस घृत या तेलको लगानेसे मर्मस्थानमें उत्पन्न दुष्ट व्रण, झिरते हुए, अत्यन्त पीडावाले, अत्यन्त बढे हुए व्रण शीघ्र सूखजाते हैं और अंकुर उग आते हैं ॥ २८ ॥