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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 1035

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १००३

सहिँजना, सेमकी फली, करेला, पुनर्नवा, कुम्भेरु, चीता शहद और शोथरोगमें कहीहुई सम्पूर्ण ओषधियें हितकारी हैं ॥ १८ ॥ १९ ॥

पक्रावस्थे शस्त्रकर्म पुराणा रक्तशालयः ।
घृतं तैलं मुद्गरसो विलेपो धन्वजा रसाः ॥ २० ॥
शालिञ्चशाकं कदलं पटोलं हिमवालुका ।
चन्दनं तप्तशीताम्बु सर्वं चापि व्रणोदितम् ॥ २१ ॥
नराणां विद्रधिब्याधौ यथावस्थं यथामलम् ।
पथ्यान्येतानि सर्वाणि निर्द्दिष्टानि महर्षिभिः ॥ २२ ॥

एवं विद्रधिकी पक्क अवस्थामें शस्त्रक्रिया करना, पुराने लाल शालिके चावल, घी, तेल, मूँगका यूष, विलेपी और मरुदेशके पशु-पक्षियोंका मांसरस, शालिञ्चशाक, केलेकी कच्ची फली, परवल, कपूर, चन्दन, गरम करके शीतल किया हुआ जल और व्रणरोगके अधिकारमें कहेहुए सब पदार्थ दोषोंकी न्यूनाधिकता तथा अवस्थानुसार देवे। प्राचीन आयुर्वेदाचार्य महर्षिगणने पूर्वलिखित सब पदार्थोंको हितकर विधान किया है ॥ २०-२२ ॥

विद्रधिरोगमें अपथ्य ।

शोथिनां यान्यपथ्यानि व्रणिनामहितानि च ।
क्रमादामे च पक्वे च विद्रधौ वर्जयेन्नरः ॥ २३ ॥

शोथाधिकारमें जो द्रव्य अपथ्य विधान कियेगये हैं उनको अपक्वविद्रधिमें और व्रणरोगमें जिनको अहितकर कहा है उन सब पदार्थोंको पक्व विद्रधिमें त्याग देवे२३

इति भैषज्यरत्नावल्यां विद्रधिचिकित्सा ।


व्रणशोथकी चिकित्सा ।

आदौ विम्लापनं कुर्याद् द्वितीयमवसेचनम् ।
तृतीयमुपनाहं तु चतुर्थी पाटनक्रियाम् ॥ १ ॥
पञ्चमं शोधनं कुर्य्यात्षष्ठं रोपणमिष्यते ।
एते क्रमा व्रणस्योक्ताः सप्तमो वैकृतापहः ॥ २ ॥