भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 1016 of 1416
Read in context९८४ भैषज्यरत्नावली । [ गलगण्डादि-
बगल या कूर्परसन्धिगत अपचीरोगमें पहुँचेके ऊपरके भागमें एक एक अंगुलके
अन्तरसे यथाक्रम तीन रेखा करे। इससे रुधिरका स्राव होकर अपचीरोग दूर
होता है ॥ ६ ॥
दण्डोत्पलभवं मूलं बद्धं पुष्येऽपचीं जयेत् ।
अपामार्गस्य वा छिन्द्याज्जिह्वातलगते शिरे ॥ ७ ॥
श्वेतदंडोत्पलकी जडको पुष्यनक्षत्रमें लाकर देहमें बाँधे अथवा उक्त विधिके अनु-
सार चिरचिटेकी जडको बाँधे किंवा चिरचिटेकी जडसे जीभके नीचेके भागमें
स्थित दोनों शिराओंको छेदन करे तो अपची नष्ट होती है ॥ ७ ॥
ग्रन्थिकी चिकित्सा ।
ग्रन्थिष्वामेषु कुर्वीत भिषक् शोथप्रतिक्रियाम् ।
पक्वानुत्पाट्य संशोध्य रोपयेद्व्रणभेषजैः ॥ १ ॥
अपक्व ग्रन्थिरोगमें वक्ष्यमाण व्रणशोथरोगकी समान चिकित्सा करे और जब
वह पकजाय तब छेदकर राध, पीब आदिको निकालकर घावको भरनेवाली औषधि
भरदेवे ॥ १ ॥
हिंस्त्रा सरोहिण्यमृता च भार्गी श्योनाकबिल्वागुरुकृष्णगन्धाः ।
गोपित्तपिष्टाः सह तालपर्ण्या ग्रन्थौ विधेयोऽनिलजे प्रलेपः २
कटैरी, कुटकी, गिलोय, भारङ्गी, शोनापाठा, बेलकी छाल, अगर, सहिजनेकी
छाल और मुसली इन औषधियोंको समान भाग लेके गोपित्तमें पीसकर वातजन्य
ग्रंथिपर लेप करनेसे शीघ्र उपकार होता है ॥ २ ॥
जलायुकाः पित्तकृते हितास्तु क्षीरोदकाभ्यां परिषेचनं च ।
काकोलिवर्गस्य तु शीतलानि पिबेत्कषायाणि सशर्कराणि ॥
द्राक्षारसेनेक्षुरसेन वापि चूर्णं पिबेद्दारि हरीतकीनाम् ॥ ३ ॥
पित्तजनित ग्रन्थिरोगमें जोंक लगवाकर रक्त निकलवावे और जलमिश्रित दूध
पीवे एवं कोकोल्यादिगणकी औषधियोंका शीतल क्वाथ मिश्री मिलाकर पान करें
अथवा दाखके शितल क्वाथ किंवा ईखके रसमें हरडोंका चूर्ण डालकर पान
करे ॥ ३ ॥
मधूकजम्ब्वर्जुनवेतसानां त्वग्भिः प्रदेहानवतारयेच्च ।
हृतेषु दोषेषु यथानुपूर्व्या ग्रन्थौ भिषक् श्लेष्मसमुद्भवे तु ॥
स्विन्ने च विम्लापनमेव कुर्यादङ्गुष्ठवेणूहषदिसुतैश्च ॥ ४ ॥