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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1005 of 1416

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Page 1005

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९७३


बिल्वादिचूर्ण ।

मूलं बिल्वकपित्थयोररलुकस्याग्नेर्बृहत्योर्द्वयोः
श्यामापूतिकरञ्जशिग्रुकतरोर्विश्वौषधारुष्करम् ।
कृष्णाग्रन्थिकचव्यपंचलवणक्षाराजमोदान्वितं
पीतं काञ्जिककोष्णतोयमथितं चूर्णीकृतं ब्रध्नजित् ॥२३॥

बेल, कैथ, शोनापाठा, चीता, कटाई, कटेरी, विधारा, काँटाकरञ्ज और सहिंजना इन सबकी जड एवं सोंठ, भिलावा, पिपल, पीपलामूल, चव्य, पाँचों नमक, जवाखार और अजमोद इन सबको समान भाग लेकर एकत्र बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णकी उपयुक्त मात्राको गरम काँजीमें मिलाकर पान करनेसे ब्रध्न्रोग दूर होता है ॥ २३ ॥


भक्तोत्तरयिचूर्ण ।

अभ्रकं गन्धकं चैव पिप्पली लवणानि च ।
त्रिक्षारं त्रिफला चैव हरितालं मनःशिला ॥ २४ ॥
पारदं चाजमोदा च यमानी शतपुष्पिका ।
जीरकं हिङ्गु मेथी च चित्रकं चविका वचा ॥ २५ ॥
दन्ती च त्रिवृता मुस्तं शिला च मृतलौहकम् ।
अञ्जनं निम्बबीजानि पटोलं वृद्धदारकम् ॥ २६
सर्वाणि चाक्षमात्राणि श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ।
शतं कानकबीजानि शोधितानि प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥

अभ्रकभस्म, शुद्ध गन्धक, पीपल, पाँचोंनमक, जवाखार, सज्जी, सुहागा, हरड, बहेडा, आमला, हरताल, मैनसिल, शुद्ध पारा, अजमोद, अजवायन, सौंफ, जीरा, हींग, मेथी, चीतेकी जड, चव्य, वच, दन्तीमूल, निसोत, नागरमोथा, शिलाजीत, लोहेकी भस्म, रसौंत, नीमके बीज, परवल और विधारा ये सब औषधियाँ दो दो तोले लेकर एकत्र करके कूटपीस लेवे । फिर इसमें शोधित धतूरेके सौ बीज मिलाकर बारीक चूर्ण तैयार करलेवे ॥ २४–२७ ॥

एतदग्निविवृद्ध्यर्थमृषिभिः परिकीर्तितम् ।
श्लीपादान्यन्त्रवृद्धिं च वातवृद्धिं च दारुणाम् ॥ २८ ॥