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बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages
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कन्या जब पूजन समाप्त करके मंदिर से बाहर निकली तो उसने अपनी सखी से
कहा—"सखी, जरा जाकर देखो तो मैंने जिन महापुरुष को यहां देखा था, वे कहां है ?
मुझे वह कोई श्रेष्ठ व पूज्य पुरुष महसूस हुए थे, अतः उनसे प्रार्थना करो कि वे यहां पधारें
और हमारा आतिथ्य स्वीकार करें।"

सखी जब राजा चंद्रसेन और सत्त्वशील के पास पहुंची और उन्हें कन्या का संदेश
सुनाया तो चंद्रसेन ने उपेक्षा से कहा—"हमारा इतना ही आतिथ्य बहुत है। अधिक
की कोई आवश्यकता नहीं है।"

कन्या की सखी ने लौटकर जब यही बात उसे बताई तो वह असुर कन्या उससे
मिलने को और भी व्यग्र हो गई। इस बार वह स्वयं उन दोनों के पास पहुंची और उनसे
आतिथ्य ग्रहण करने का निवेदन किया। इस पर राजा चंद्रसेन ने सत्त्वशील की ओर
संकेत करते हुए उस कन्या से कहा—"मैं इनके कहने के अनुसार देवी का दर्शन करने के
लिए ध्वज-मार्ग से यहां आया था। मैंने माता कात्यायनी के परम अद्भुत मंदिर और
उसके बाद तुमको भी देखा। उसके बाद हमें और किस आतिथ्य की आवश्यकता है ?"

यह सुनकर वह कन्या बोली—"तब आप लोग त्रिलोक में अद्भुत मेरे दूसरे
नगर को देखने के लिए कौतूहल से ही मेरे साथ चलिए।" उस कन्या के ऐसा कहने
पर राजा चंद्रसेन ने हंसकर कहा—"इस सत्त्वशील ने मुझे उसके बारे में भी
बतलाया है, वहां पर स्नान करने के लिए एक सरोवर भी है।"

तब उस कन्या ने कहा—"देव, आप ऐसी बात न कहें। मैं यों ही धोखा देने
वाली नहीं हूं। तब फिर, आप जैसे पूज्य को कैसे धोखा दे सकती हूं। मैं आप लोगों
की वीरता के उत्कर्ष से आपकी अनुचरी हो गई हूं। अतः आपको इस प्रकार मेरी
प्रार्थना अस्वीकार नहीं करनी चाहिए।"

असुर कन्या का ऐसा आग्रह सुनकर राजा चंद्रसेन मान गया और वह सत्त्वशील
सहित प्रभा-मंडल के निकट जा पहुंचा। वह कन्या उन्हें किसी प्रकार खुले दरवाजे से
अंदर ले गई, जहां उन्होंने उसके दूसरे अलौकिक नगर को देखा। वह सचमुच एक
विलक्षण नगर था। वहां सभी वस्तुएं सदा वर्तमान रहती थीं। वृक्षों में फूल और फल
बने रहते थे और वह समूची नगरी रत्न तथा सुवर्ण से बनी हुई थी। उस नगरी की
भव्यता ऐसी थी जैसे वे दोनों सुमेरु पर्वत पर आ पहुंचे हों।

असुर कन्या ने एक सुन्दर कक्ष में उन्हें ले जाकर बहुमूल्य रत्न जड़ित सिंहासन
पर बैठाया और अनेक प्रकार से उनका आतिथ्य सत्कार करके अपना परिचय
दिया—"मैं असुरराज कालनेमि की कन्या हूं। मेरे पिताजी की मृत्यु चक्रधारी विष्णु
के चक्र से हुई थी। यहां जरा (वृद्धापन) और मृत्यु की बाधा नहीं होती और सभी
मनोकामनाएं स्वतः ही पूरी हो जाती है।" फिर उसने राजा चंद्रसेन से प्रार्थना
की—"अब आप ही मेरे पिता हैं और इन दोनों नगरों के साथ मैं आपके अधीन हूं।
मेरी प्रार्थना स्वीकार करके आप मुझे अनुग्रहित कीजिए।" इस प्रकार जब उस

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कन्या ने अपना सब कुछ राजा को सौप दिया, तब वह कन्या से बोला—"बेटी। यदि ऐसी ही बात है तो मैं तुम्हें इस सत्त्वशील के साथ विवाह बंधन में बांधता हूं। यह वीर है, धीर है और दोषरहित है। अब यह मेरा मित्र भी है और संबंधी भी।"

राजा के इस आग्रह को असुर कन्या ने तत्काल स्वीकार कर लिया और सत्त्वशील के साथ विवाह रचा लिया। सत्त्वशील के मन की साध पूरी हो गई और उसने राजा चंद्रसेन का बहुत-बहुत आभार माना। विदाई के समय राजा चंद्रसेन ने सत्त्वशील से कहा—"मित्र, तुम्हारे मैंने दो आंवले खाए थे। उनमें से एक का ऋण तो मैंने चुका दिया है, एक का ऋण मुझ पर अभी बाकी है।" फिर उसने असुर कन्या से कहा—"बेटी, मुझे मार्ग दिखलाओ क्योंकि अब मैं अपने नगर को लौट जाना चाहता हूं।" राजा के ऐसा कहने पर उस असुर कन्या ने उन्हें 'अपराजित' नाम का खड्ग और खाने के लिए एक ऐसा फल दिया जिससे न तो राजा पर कभी बुढ़ापा आए और न ही उसे मृत्यु का भय सताए।

फिर उन दोनों चीजों को लेकर असुर कन्या द्वारा बतलाए सरोवर में डुबकी लगाकर राजा वापस अपने देश जा पहुंचा। सत्त्वशील भी सुखपूर्वक उस असुर कन्या के साथ दोनों नगरों पर शासन करने लगा।

यह कथा सुनाकर बेताल ने विक्रमादित्य से पूछा—"राजन, अब तुम मुझे यह बतलाओ कि समुद्र में डुबकी लगाने का उन दोनों में से किसने अधिक साहस दिखाया ? जानते हुए भी यदि तुम इस प्रश्न का उत्तर न दोगे तो तुम्हारे सिर के कई टुकड़े हो जाएंगे।"

तब बेताल के प्रश्न का उत्तर राजा ने इस प्रकार दिया—"हे बेताल, उन दोनों में मुझे सत्त्वशील ही अधिक साहसी लगा क्योंकि वह वस्तुस्थिति को न जानते हुए, बिना किसी आशा के समुद्र में कूदा था। जबकि, राजा चंद्रसेन को सभी बातें पहले से ही मालूम थीं और वह विश्वास के साथ समुद्र में कूदा था। वह असुर कन्या को भी नहीं जानता था क्योकि वह जानता था कि इच्छा होने पर भी वह उसे पा नहीं सकेगा।"

"तुमने सही उत्तर दिया राजन ! किंतु मेरे प्रश्न का उत्तर देने में तुमने अपना मौन भंग कर दिया इसलिए मैं चला।" यह कहकर बेताल विक्रमादित्य के कंधे से खिसककर पुनः उसी वृक्ष की ओर उड़ गया।

राजा भी उसी प्रकार फिर से उसे लाने के लिए तेजी से लौट पड़ा।

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आठवां बेताल: तीन चतुर पुरुषों की कथा

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आठवां बेताल

तीन चतुर पुरुषों की कथा

पहले की तरह राजा विक्रमादित्य फिर उस शिंशपा (शीशम) के वृक्ष के पास जा पहुंचा। बेताल को वृक्ष से उतारकर उसने कंधे पर डाला और मौन भाव से अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा।

कुछ आगे चलने पर बेताल ने फिर मौन भंग किया और राजा से बोला—‘‘राजन ! उस योगी के कारण तुम सचमुच बहुत परिश्रम कर रहे हो। तुम्हारे परिश्रम की थकान मिटाने के लिए मै तुम्हें एक और कथा सुनाता हूं किंतु शर्त वही रहेगी। कहानी सुनाते समय मौन ही रहना, अन्यथा मैं फिर इसी स्थान पर लौट आऊंगा। ’’

राजा की सहमति पर बेताल ने फिर एक कथा सुनाई।

अंगदेश में ‘वृक्षघट’ नाम का एक ग्राम था जो ब्राह्मणों को दान में मिला था। वहां विष्णुस्वामी नाम का एक बहुत धनवान अग्निहोत्री ब्राह्मण रहता था। उस ब्राह्मण के तीन पुत्र थे जो अपने पिता के समान ही बुद्धिमान थे। एक बार उनके पिता ने एक यज्ञ का आयोजन किया, जिसके निमित्त उसने अपनी तीनों पुत्रों से एक कछुआ लाने को कहा। पिता की आज्ञा मानकर उसके तीनों पुत्र एक समुद्र तट पर कछुआ लाने के लिए पहुंचे। कछुआ पाकर सबसे बड़े भाई ने छोटे भाइयों से कहा—‘‘सुनों बंधुओं, मुझे तो इस कछुए की दुर्गंध और चिकनेपन से घृणा हो रही है। अतः पिताजी के यज्ञ के लिए तुम दोनों ही इसे उठाओ और ले जाकर पिताजी को सौंप दो। ’’

इस पर उसके दोनों छोटे भाइयो ने कहा—‘‘यदि तुम्हें इससे घृणा है तो हमको क्यों न होगी ? अतः जब तक तुम इसे ले जाने में सहयोग नहीं करोगे, हम इसे लेकर नहीं जाएंगे। ’’

यह सुनकर बड़ा भाई बोला—‘‘तुम्हें इसे लेकर जाना ही होगा। यदि तुम इसे लेकर नहीं गए तो पिताजी का यज्ञ पूरा नहीं हो सकेगा और तुम लोग नरक के भागी बनोगे। ’’

बड़े भाई के मुख से यह बात सुनकर उसके दोनो छोटे भाई हंसे और बोले—‘‘भैया, तुम हमें धर्म का ज्ञान कराते हो। इस अवस्था में जो हमारा धर्म है, तुम्हारा भी तो वही है। ’’

छोटे भाइयों की बात सुनकर बड़ा भाई कुछ क्रुद्ध हो गया और बोला—‘‘तुम लोग मेरी दक्षता नहीं जानते, इसलिए मैं किसी घृणित वस्तु को नहीं छू सकता। इस पर मंझला भाई बोला—‘‘दक्षता की बात क्या करते हो, मैं भी कुछ कम नहीं। मै तुमसे अधिक दक्ष हूं। ’’ तब बड़े भाई ने कहा—‘‘यदि ऐसी बात है तो हममें से सबसे छोटा इस कछुए को लेकर चले। ’’


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यह सुनकर सबसे छोटे की मूंछें तन गईं। बोला-“तुम दोनों ही मूर्ख हो इसलिए मुझसे ऐसी आशा रखते हो। जानते नहीं कि मैं तुम दोनों से अधिक चतुर हूं। मै शय्या दक्ष हूं।”

इस प्रकार वे तीनों भाई आपस में ही झगड़ने लगे और कछुए को छोड़कर अपने झगड़े के निबटारे हेतु उस प्रदेश के राजा के पास, विटंकपुर नामक उसके नगर की ओर चल पड़े।

राजा के महल में अंदर गए और राजा को सारा वृत्तांत सुनाया।

सुनकर राजा ने कहा—“आप तीनों यहीं ठहरिए। मैं आप तीनों की परीक्षा लूंगा।”

भोजन के समय राजा ने उस तीनों को बुलवाया और अपने रसोइए को कहकर उनके सामने नाना-प्रकार के व्यंजन परोसवाए।

दोनों छोटे भाई तो उस स्वादिष्ट भोजन के खाने लगे किंतु बड़ा भाई भोजन की उपेक्षा कर एक ओर मुंह बनाए बैठा रहा। उसने एक ग्रास भी मुंह में न डाला।

जब राजा ने स्वयं उससे पूछा-“आर्य, भोजन तो स्वादिष्ट और सुगंधित है। आप खाते क्यों नहीं ?” तो उसने उत्तर दिया-“राजन, इस भात में मुर्दे के धुएं की दुर्गंध है, इसीलिए स्वादिष्ट होने पर भी मेरी इच्छा इसे खाने को नहीं हो रही।”

उसके ऐसा कहने पर, राजाज्ञा से सबने उस भात को सूंघने के बाद कहा-“उत्तम कोटि का यह चावल बिल्कुल दोषरहित है। इसमें किसी प्रकार की गंध भी नहीं है।”

भोजनदक्ष बड़े भाई ने भी उसे नाक से सूंघा, पर खाया नहीं। इस पर राजा ने उन चावलों के स्रोत का पता लगवाया कि वह कहां पैदा किए गए थे, तो पता चला कि चावल एक ऐसे खेत के थे, जो श्मशान के बिल्कुल पास था। भोजनदक्ष का कहना बिल्कुल सच था, श्मशान में मुर्दे जलते ही हैं, उन्हीं के जलने की बदबू चावलों में रच-बस गई थी।

राजा भोजनदक्ष की योग्यता को मान गया। उसने अपने रसोइया को दूसरा भोजन बनाकर लाने का आदेश दिया। भोजन के उपरान्त राजा ने उन तीनों को अलग-अलग कमरों में भेज दिया। फिर उसने नगर की एक गणिका को बुलवा भेजा। उस सर्वांग सुन्दरी को अच्छी तरह सजा-संवारकर राजा ने उस दूसरे, नारीदक्ष ब्राह्मण के पास भेजा। पूर्णिमा के समान मुख वाली और काम को जगाने वाली वह स्त्री, राजा के अनुचरों के साथ उस नारीदक्ष के शयन गृह में गई।

ज्योंही वह गृह में प्रविष्ट हुई, उसकी कांति से कमरा दमक उठा। किंतु उस नारीदक्ष को मूर्छा-सी आने लगी। उसने अपनी नाक दबा ली और राजा के अनुचरों से कहा-“इसे यहां से ले जाओ, नहीं तो मैं मर जाऊंगा क्योंकि इसके भीतर से बकरी की दर्गध आ रही है। उसकी यह बातें सुनकर राजा के अनुचर उस घबराई हुई गणिका को राजा के पास ले गए और उससे सारा वृत्तांत कह सुनाया। राजा ने

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तत्काल ही नारीदक्ष को बुलवाकर कहा—"इस गणिका ने चंदन, कपूर आदि उत्तम सुगंधियां लगा रखी हैं, जिनकी सुगंध चारों ओर फैल रही है। यह सजी-संवरी है फिर भला इसके शरीर से बकरी की गंध कैसे आ सकती है ?"

राजा के ऐसा कहने पर भी जब नारीदक्ष ने यह बात नहीं मानी, तो राजा सोच में पड़ गया। युक्तिपूर्वक उस गणिका से पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि बचपन में उसकी माता तथा भाई के मर जाने पर उसे बकरी का दूध पिलाकर पाला गया था।

तब राजा नारीदक्ष की चतुराई पर बहुत विस्मित हुआ और उसकी प्रशंसा की। अनन्तर, उसने तीसरे ब्राह्मण को, जो शय्यादक्ष था, उसकी इच्छा के अनुसार शय्या दी। उस पलंग पर सात गद्दे बिछे हुए थे।

बहुमूल्य कक्ष में वह शय्यादक्ष पलंग पर सोया, जिस पर धुली हुई और मुलायम चादर बिछी हुई थी। अभी रात आधी हीं बीती थी कि वह नींद से जाग उठा और हाथ से बगल को दबाए हुए पीड़ा से कराहने लगा। राजा के जो अनुचर वहां थे, उन्होंने देखा कि उसके शरीर में केश का एक गहरा और कठोर दाग बन गया है। अनुचर ने जब राजा से जाकर यह बात कही तो उसने कहा— "तुम लोग जाकर देखो कि गद्दों के नीचे कुछ है या नहीं।" उन लोगों ने एक-एक गद्दे के नीचे देखा, तो सबसे अंतिम गद्दे के नीचे पलंग पर एक केश पड़ा मिला। उसे लाकर जब राजा को दिखलाया गया तो साथ आए शय्यादक्ष के अंग पर वैसा ही निशान देखकर राजा को विस्मय हुआ। राजा यह सोचकर बहुत देर तक आश्चर्य करता रहा कि सात गद्दों के नीचे उसे केश का दाग शय्यादक्ष के शरीर पर कैसे पड़ गया। इसी सोच-विचार में किसी तरह उसने वह रात बिताई।

दूसरे दिन राजा ने उन तीनों को उनकी अद्भुत चतुरता और सुकुमारता के लिए तीन लाख स्वर्णमुद्राएं दीं। तब वे तीनों सुखपूर्वक रहने लगे और कछुए को तथा पिता के यज्ञ में विघ्न पड़ने से जो पाप हुआ था, उसको भूल गए।

यह अद्भुत कथा सुनाकर बेताल ने विक्रमादित्य से पूछा—"राजन, पहले कहे गए मेरे शाप को याद करते हुए अब तुम यह बताओ कि उन तीनों—भोजनदक्ष, नारीदक्ष और शय्यादक्ष—में से कौन अधिक चतुर था ?"

यह सुनते ही राजा ने बेताल को उत्तर दिया—"बेताल ! मैं उन तीनों में शय्या-दक्ष को ही श्रेष्ठ समझता हूं क्योंकि उसकी बात में कुछ छिपा-ढका नहीं था। उसके अंग में केश का दाग स्पष्ट रूप से देखा गया था। दूसरों ने जो कुछ कहा, हो सकता है औरों के मुंह से शायद वे बातें उन्होंने पहले से जान ली हों।"

राजा के ऐसा कहने पर पहले की ही तरह वह बेताल उसके कंधे से उतरकर चला गया। राजा भी उसी तरह घबराए बिना उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

$$\square\ \square\ \square$$

54 $\square$ बेताल पच्चीसी

नौवां बेताल: राजकुमारी अनंगरति की कथा

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नौवां बेताल

राजकुमारी अनंगरति की कथा

पहले की भांति उस शिंशपा-वृक्ष के पास पहुंचकर राजा विक्रमादित्य ने बेताल को फिर से नीचे उतारा और उसे अपने कंधे पर डालकर गंतव्य की ओर चल पड़ा।

रास्ते में फिर बेताल ने मौन भंग किया—‘‘राजन ! कहां राज्य का सुख-भोग और कहां रात के इस प्रहर में इस महाश्मशान में घूमना। क्या तुम भूत-प्रेतों से भरे इस श्मशान को नहीं देखते, जो रात में भयानक बना हुआ है और जहां चिता के धुएं की तरह अंधकार बढ़ता जा रहा है। तुमने उस योगी के कहने पर न जाने क्यों इस असाध्य कार्य को करना स्वीकार कर लिया है। मुझे यह सोचकर तुम पर दया आ रही है। तुम्हारा श्रम भुलाने के लिए मै तुम्हें फिर से एक कथा सुनाता हूं, ताकि तुम्हारा मार्ग सुगम हो।’’

तब विक्रमादित्य के सहमति देने पर बेताल ने यह कथा सुनाई।

अवन्ती में एक नगरी है, जिसे सृष्टि के आरंभ में देवताओं ने बनाया था। सर्पों (सांपों) और भभूत (भस्म) से विभूषित शिव के विराट शरीर के समान वह नगरी भी बहुत विशाल थी और ऐश्वर्य के प्रत्येक साधन से सुशोभित थी।

जो नगरी सतयुग में पद्मावती, त्रेता में भोगवती तथा द्वापर में हिरण्यवती कही जाती थी, वही कलियुग में उज्जायिनी के नाम से प्रसिद्ध हुई। उस उज्जायिनी में वीरदेव नाम के एक राजा थे, जो भूपतियों में श्रेष्ठ थे। उनकी पटरानी का नाम पद्मरति था। पुत्र की कामना से उस राजा ने अपनी पत्नी सहित मंदाकिनी के तट पर जाकर, तपस्या के द्वारा भगवान महादेव की आराधना की।

बहुत दिनों तक तपस्या करने के बाद जब उन्होंने स्नान और अर्चन की विधियां पूर्ण कर लीं, तो भगवान शंकर प्रसन्न हुए और आकाश से उनकी वाणी सुनाई पड़ी—‘‘राजन, तुम्हारे कुल में पराक्रमी पुत्र उत्पन्न होगा। अतुलनीय रूपवती एक कन्या भी तुम्हारे घर में जन्म लेगी, जो अपनी सुंदरता से अप्सराओं को भी मात करेगी।‘‘

यह आकाशवाणी सुनकर राजा वीरदेव की कामना पूरी हो गई। वह अपनी पत्नी सहित अपनी नगरी में चला आया। वहां, पहले उसे शूरदेव नाम का एक पुत्र पैदा हुआ और फिर उसकी पद्मरति ने एक कन्या को जन्म दिया। अपने सौंदर्य से कामदेव के मन में भी आकर्षण उत्पन्न करने वाली उस कन्या का नाम उसके पिता ने अनंगरति रखा।

जब वह कन्या बड़ी हुई, तब उसके योग्य पति प्राप्त करने के लिए उसके पिता ने भूमंडल के सभी राजाओं के चित्र मंगवाए। राजा को जब उनमें से कोई भी अपनी कन्या

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के योग्य न जान पड़ा, तब उसने स्नेह से अपनी पुत्री से कहा—‘‘बेटी, मुझे तुम्हारे योग्य कोई वर नहीं मिलता, अतः तुम स्वयंवर द्वारा अपना वर स्वयं ही चुनो।’’

पिता की यह बात सुनकर उस राजकुमारी ने कहा—‘‘पिताजी, लज्जा के कारण मैं स्वयंवर नहीं करना चाहती, किंतु जो भी सुरूप युवक कोई अनूठी कला जानता हो, आप उसी से मेरे विवाह कर सकते हैं। इससे अधिक मैं और कुछ नहीं चाहती।’’

अपनी कन्या अनंगरति की बात सुनकर राजा उसके लिए वैसे ही वर की खोज करने लगा।

इसी बीच, लोगों के मुंह से यह वृत्तांत सुनकर दक्षिण-पथ से चार पुरुष वहां आ पहुंचे, जो वीर थे, कलाओं में निपुण थे और भव्य आकृति वाले थे।

राजा ने उनका स्वागत-सत्कार किया। तब उस राजपुत्री की इच्छा रखने वाले वे चारों पुरुष, एक के बाद एक राजा ने अपने-अपने कौशल का वर्णन करने लगे।

उनमें से एक ने कहा—‘‘मैं शूद्र हूं, मेरा नाम पंचपट्टिक है। मैं प्रतिदिन पांच जोड़े उत्तम वस्त्र तैयार करता हूं। उनमें से एक जोड़ा वस्त्र मैं देवता को चढ़ाता हूं और एक जोड़ा ब्राह्मण को देता हूं। एक जोड़ा मैं पहनने के लिए रखता हूं। इस राजकन्या का विवाह यदि मुझसे होगा तो एक जोड़ा मैं इसे दूंगा और एक जोड़ा वस्त्र बेचकर मैं अपने खाने-पीने का निर्वाह करूंगा। अतः इस अनंगरति का विवाह आप मुझसे करें।’’

पहले पुरुष के बाद दूसरा बोला—‘‘राजन ! मैं भाषाज्ञ नामक वैश्य हूं। मैं सब पशु-पक्षियों की बोलियां जानता और समझता हूं। अतः इस राजपुत्री को आप मुझे दे दें।’’

अनंतर, जब दूसरा ऐसा कह चुका तो तीसरा बोला—‘‘राजन, मैं एक पराक्रमी क्षत्रिय हूं। मेरा नाम खड्गधर है। खड्ग विद्या में मेरी बराबरी करने वाला इस धरती पर कोई नहीं है। अतः राजन, आप अपनी कन्या का विवाह मुझसे ही करें।’’

यह सुनकर चौथा बोला—‘‘मैं एक ब्राह्मण हूं, राजन। मेरा नाम जीवदत्त है। मेरे पास ऐसी विद्या है, जिससे मैं मरे हुए प्राणियों में जान डाल देता हूं। अतः ऐसे कार्य में दक्ष मुझको आप अपनी कन्या के लिए पति रूप में स्वीकार करें।’’

दिव्य वेश वाले उन चारों पुरुषों के ऐसा कहने पर राजा सोच में पड़ गया और विचार करने लगा कि वह किसके साथ अपनी कन्या का विवाह करे।

इतनी कथा सुनाकर बेताल ने विक्रमादित्य से पूछा—‘‘राजन, अब तुम्हीं बताओ कि राजकुमारी अनंगरति का विवाह उन चारों में से किसके साथ होना चाहिए ? जानकर भी यदि तुम इसका सही उत्तर नहीं दोगे तो मेरे श्राप द्वारा तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे।’’

यह सुनकर बेताल को राजा विक्रमादित्य ने बताया—‘‘योगेश्वर, आप समय बिताने के लिए ही, मुझे मौन भंग करने को विवश करते हैं, अन्यथा आपका यह प्रश्न

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बेताल पच्चीसी ▢ 57

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कौन बड़ा जटिल है ? आप स्वयं ही सोचिए, उस शूद्र जुलाहे को क्षत्रिय कन्या कैसे
दी जा सकती है ? वैश्य को भी क्षत्रिय कन्या नहीं दी जा सकती और फिर उसे,
जिसे पशि-पक्षियों की भाषा का ज्ञान है, उसका भी क्या उपयोग है ? तीसरा, जो
ब्राह्मण, अपना स्वयं का काम छोड़कर बाजीगर बन गया है, वह भी उसके पति होने
के योग्य नहीं है, क्योंकि वह ब्राह्मण अपना काम छोड़कर पतित बन गया है। अतः
राजपुत्री के योग्य तो वह क्षत्रिय पुरुष है। उसी से राजपुत्री का विवाह करना उचित
है जो कुल में समान है। अपनी विद्या जानने वाला तथा पराक्रमी है।"

राजा की बात सुनकर बेताल ने कहा—"राजन, तुमने बिल्कुल सही उत्तर
दिया। राजकुमारी का विवाह उसी से होना चाहिए क्योंकि समान कुल और पराक्रमी
व्यक्ति के साथ ही कन्या का विवाह अनुकूल होता है। पर, मेरे प्रश्न का उत्तर देते
समय तुम हम दोनों के बीच हुई शर्त को भूल गए, अतः अब मैं चलता हूं।"

यह कहकर बेताल राजा के कंधे से उतर गया और पुनः उसी शिंशपा-वृक्ष की
ओर उड़ गया, जहां से विक्रमादित्य उसे लाए थे।

राजा विक्रमादित्य ने भी अपना हौसला न खोया। बेताल के जाते ही वह भी
पुनः उसे लाने के लिए उस महाश्मशान में उसी वृक्ष की ओर चल पड़ा।

<div style="text-align: right;">□□□</div>

58 🞎 बेताल पच्चीसी

दसवां बेताल: मदनसेना की कथा

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दसवां बेताल

मदनसेना की कथा

अनंतर, विक्रमादित्य ने शिंशपा-वृक्ष के पास जाकर बेताल को वृक्ष से उतारा, अपने कंधे पर डाला और वहां से चले पड़ा।

जाते हुए राजा से, उसकी पीठ के ऊपर बैठे हुए बेताल ने कहा—‘‘राजन ! तुम थक गए हो, इसलिए थकावट दूर करने के लिए मुझसे यह कथा सुनो।’’

किसी समय वीरबाहु नाम का एक श्रेष्ठ राजा था, जो छोटे-बड़े अनेक राज्यों पर राज करता था। उसकी राजधानी अनगपुर नामक नगरी थी जो वैभव व भव्यता में कुबेर की नगरी को भी मात करती थी।

उसी नगरी में अर्थदत्त नाम का एक महाधनी व्यापारी रहता था। व्यापारी की दो संतानें थीं। बड़ा लड़का, जिसका नाम धनदत्त था और छोटी एक लड़की, जिसका नाम मदनसेना था। मदनसेना कन्याओं मे रत्न के समान थी।

एक दिन मदनसेना बगीचे में अपनी सखियों के साथ खेल रही थी। तभी धनदत्त का एक मित्र, जिसका नाम धर्मदत्त था, धनदत्त से मिलने पहुंचा। वहां बगीचे में अपनी सहेलियों के मध्य हंसी-मजाक करती हुई मदनसेना को जब उसने देखा तो बस देखता ही रह गया। धर्मदत्त उसे देखते ही उस पर आसक्त हो गया था। उसका हृदय कामदेव के बाण-समूहों से छिदकर रह गया था।

मदनसेना के शरीर से लावण्य का रस झर रहा था। उसे देखकर हठात् ही धर्मदत्त के मुख से निकल गया—‘‘आह ! अलौकिक रूप की शोभा से जगमगाने वाली इस कन्या को शायद स्वयं कामदेव ने मेरा हृदय बेधने के लिए इस तीखे तीर के रूप में बनाया है। ’’

वह बहुत देर तक एक पेड़ की ओट से मदनसेना के रूप का रसपान करता रहा और जब मदनसेना अपने घर के अंदर चली गई तो उसका मन उसे पाने के लिए व्यथित होने लगा। वह दुखी मन से घर लौटा और बिस्तर पर पड़ गया। उसके कई मित्रों ने उसकी इस विकलता का कारण पूछा किंतु धर्मदत्त कुछ भी न कह सका।

उस रात स्वप्न में भी वह अपनी प्रिया को ही देखता रहा और उसकी मनुहार करता रहा। किसी ने सच ही कहा है—‘उत्सुक हृदय वाला मनुष्य क्या-क्या नहीं करता ?’

सवेरे उठकर वह फिर उसी बगीचे में गया। वहां उसने मदनसेना को अकेली बैठा देखा। वह अपनी सखियों की प्रतीक्षा कर रही थी। उसका आलिंगन करने के इच्छा से वह उसके पास पहुंचा और उसके निकट झुककर प्रेम के कोमल वचनों से उसे रिझाने लगा।

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तब मदनसेना बोली—‘‘मैं कुमारी हूं, दूसरे की वाग्दत्ता पली भी हूं। अब मैं आपकी नहीं हो सकती क्योंकि मेरे पिता समुद्रदत्त नामक व्यापारी से मेरा रिश्ता तय कर चुके हैं। थोड़े ही दिनों में मेरा विवाह होने वाला है इसलिए आप चुपचाप चले जाएं, क्योंकि कोई देख लेगा तो मुझे दोष लगेगा।’’

इस प्रकार, बहुत तरह से उसके समझाने पर धर्मदत्त ने कहा—‘‘मेरा चाहे जो भी हो, मैं तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकता।’’

उसकी यह बात सुनकर मदनसेना इस भय से विकल हो गई कि कहीं यह बल-प्रयोग न करे। उसने कहा—‘‘आपने अपने प्रेम से मुझे जीत लिया है किंतु पहले मेरा विवाह हो जाने दीजिए। पहले पिताजी को कन्यादान का चिर-आकांक्षित फल प्राप्त हो जाए, फिर मैं आपके पास चली आऊंगी।’’

यह सुनकर धर्मदत्त ने कहा—‘‘मैं यह नहीं चाहता कि मेरी प्रिया, मुझसे पहले किसी और की हो चुकी हो, क्योंकि दूसरा जिसका रस ले चुका हो, क्या उस कमल पर भौंरा प्रीति रख सकता है?’’

उसके यह कहने पर मदनसेना बोली—‘‘तब विवाह होते ही, पहले मैं आपके पास आऊंगी और तब अपने पति के पास जाऊंगी।’’

मदनसेना के ऐसा कहने पर भी उस वणिक-पुत्र ने बिना पूरे विश्वास के उसे नहीं छोड़ा। उसने शपथ के साथ उसे सत्यवचन में बांध लिया, तब उससे छुटकारा पाकर, घबराई हुई मदनसेना अपने घर गई।

विवाह का समय आने पर जब उसके विवाह का मंगल-कार्य समाप्त हुआ, तब वह पति के घर आई। हंसी-खुशी में दिन बिताकर, रात के समय, वह पति के साथ शयनकक्ष में गई।

वहां पलंग पर बैठकर भी उसने अपने पति समुद्रदत्त की आलिंगन आदि चेष्टाओं को स्वीकार नहीं किया। समुद्रदत्त ने जब अपनी मीठी-मीठी बातों से उसे रिझाने की कोशिश की तो मदनसेना की आंखों में आंसू भर आए। तब समुद्रदत्त ने यही सोचकर कि ‘‘शायद इसे मैं पसंद नहीं हूं, मदनसेना से कहा—‘सुन्दरी, यदि तुम्हें मैं पसंद नहीं हूं तो मुझे भी तुमसे कोई काम नहीं है, तुम्हें जो भी प्रिय हो, तुम उसी के पास चली जाओ’।’’

यह सुनकर मदनसेना ने सिर झुका लिया। फिर धीरे-धीरे वह बोली—‘‘आर्यपुत्र ! आप मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं किंतु मुझे आपसे कुछ कहना है। आप उसे सुनें और मुझे अभयदान दें ताकि मैं सच्ची बात आपसे कह सकूं।’’

बड़ी कठिनाई से उसके ऐसा कहने पर समुद्रदत्त ने उसका आग्रह स्वीकार कर दिया। तब वह लज्जा व विषाद से भरी भयभीत-सी बोली—‘‘एक बार जब मैं अपने

60 ▢ बेताल पच्चीसी

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बगीचे में अकेली खड़ी थी, काम-पीड़ा से आतुर मेरे भाई के एक मित्र धर्मदत्त ने मुझे रोक
लिया। जब वह जिद पर उतर आया, तब मैने, पिता को कन्यादान का फल मिल सके
और निंदा भी न हो, इस विचार से उसे वचन दिया कि विवाह हो जाने पर मैं पहले उसके
पास आऊंगी, तब अपने पति के पास जाऊंगी। अतः स्वामी, आप मुझे अपने सत्यवचन
का पालन करने की अनुमति दें। मैं उसके पास जाकर क्षण-भर मे ही आपके पास लौट
आऊंगी। बचपन से मैंने जिस सत्य का पालन किया है, उसे मैं छोड़ नहीं सकती।”
उसकी बातें सुनकर समुद्रदत्त आहत-सा हो गया। लेकिन वह वचन से बंध
चुका था इसलिए सोचता रहा—'अन्य पुरुष में आसक्त इस स्त्री को धिक्कार है।
यह जाएगी तो अवश्य ही, फिर मैं इसे सत्य से क्यों डिगाऊं? इससे मेरा विवाह
हुआ है, इसका आग्रह मुझे स्वीकार करना ही चाहिए।”
यह सब सोचकर समुद्रदत्त ने उसे जाने की अनुमति दे दी। वह उठी और अपने
पति के घर से बाहर निकल गई। अंधियारी रात में मदनसेना अकेली ही जा रही थी,
तभी मार्ग में किसी चोर ने दौड़कर उसका रास्ता रोक लिया।
चोर ने जब उससे पूछा—"तुम कौन हो और कहां जा रही हो?"
तब डरती हुई मदनसेना ने कहा—"तुम्हें इससे क्या प्रायोजन? मेरा रास्ता
छोड़ दो। यहां मुझे कुछ काम है।”
चोर ने कहा—"मैं तो चोर हूं, तुम मुझसे छुटकारा कैसे पा सकती हो?"
यह सुनकर मदनसेना बोली—"तब तुम मेरे गहने ले लो।”
चोर ने कहा—"अरी भोली, इन पत्थरों को लेकर मैं क्या करूंगा? तुम्हारा मुख
चंद्रकान्त मणि के समान है, काले केश नागमणि के मानिंद हैं, कमर हीरे का समान
है, शरीर सोने जैसा है, अवयव पद्मराग मणि के समान हैं। तुम स्वयं एक
जीती-जागती अप्सरा हो। मैं तुम्हें किसी तरह नहीं छोड़ूंगा।”
चोर के ऐसा कहने पर उस वाणिक पुत्री ने विवश होकर अपना वृत्तांत सुनाने के
बाद उस चोर से प्रार्थना करते हुए कहा—"क्षण भर के लिए तुम मुझे क्षमा करो।
तुम यहीं ठहरो, तब तक मैं अपना वचन पूरा करके शीघ्र ही तुम्हारे पास आ
जाऊंगी। मैं अपने इस वचन का उल्लंघन नहीं करूंगी।”
यह सुनकर उस चोर ने उसे सच्चाई पर अटल रहने वाली समझा और उसे छोड़
दिया, तत्पश्चात् वह चोर वहीं रुककर उसके लौटने की प्रतीक्षा करने लगा।
मदनसेना धर्मदत्त के पास पहुंची। वह मदनसेना को जी-जान से चाहता था, उसे
इस प्रकार रात्रि के समय अपने पास आई हुई देखकर उसने सारा वृत्तांत पूछा, सोचने
के बाद वह बोला—"मदनसेना, तुम्हारी सच्चाई से मैं संतुष्ट हूं लेकिन अब तुम पराई
स्त्री हो। अतः इससे पहले कि तुम्हें कोई देख ले, तुम जहां से आई हो, वहीं वापस
चली जाओ।”

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62 □ बेताल पच्चीसी

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इस प्रकार धर्मदत्त ने जब उसे छोड़ दिया, तब वह उस चोर के पास आई जो मार्ग में उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

चोर के यह पूछने पर कि—‘‘तुम जहां गई थीं, वहां का हालचाल सुनाओ। ’’

मदनसेना ने वह सारी बातें सुनाई जो धर्मदत्त ने कही थीं।

तब उस चोर ने उससे कहा—‘‘यदि ऐसी बात है, तो मैं भी तुम्हें छोड़ देता हूं। मैं तुम्हारी सच्चाई से संतुष्ट हूं। तुम अपने गहनों के साथ अपने घर जाओ। ’’

इस तरह चोर ने भी उसे छोड़ दिया और उसकी सुरक्षा के लिए उसके साथ-साथ चला। मदनसेना अपने शील की रक्षा कर सकी थी इसलिए वह प्रसन्नतापूर्वक अपने घर, पति के पास लौट आई।

छिपकर उस सती ने अपने घर में प्रवेश किया और प्रसन्नतापूर्वक अपने पति के निकट गई। उसे देखकर जब उसके पति ने पूछा, तो उसने सारा वृत्तांत उसे बतला दिया।

समुद्रदत्त ने जब देखा कि उसके चेहरे की कांति कुम्हलाई नहीं है, न ही उसके शरीर पर किसी पर-पुरुष से मिलने का कोई चिन्ह है और उसका मन भी शुद्ध है तो उसने मदनसेना को अखंडित चरित्र वाली सती स्त्री मानकर उसका सम्मान किया। अनन्तर, वह उसके साथ सुखपूर्वक सफल दाम्पत्य जीवन निर्वाह करने लगा।

उस श्मशान में यह कथा सुनाकर बेताल ने राजा विक्रमादित्य से फिर यों कहा—‘‘राजन, अब यह बतलाओ कि उस चोर और उन दोनों वणिक-पुत्रों में से त्यागी कौन था ? यदि जानते हुए भी तुम इस प्रश्न का उत्तर न दोगे तो तुम्हारा सिर सौ टुकड़ों में फट जाएगा। ’’

मौन त्यागकर राजा ने बेताल से कहा—‘‘हे योगेश्वर, त्यागी उनमें से वह चोर ही था। दोनों वणिक-पुत्र नहीं। समुद्रदत्त ने उसके विवाहित होने पर ही उसे त्याज्य समझकर उसका त्याग किया था। वह कुलीन वणिक अपनी स्त्री को दूसरे के प्रति आसक्त जानकर भी कैसे अपनाता ? दूसरे वणिक का हृदयावेग समय पाकर मंद हो गया था, फिर उसे इस बात का डर भी हुआ होगा कि सारी बातें जानकर उसका पति, सवेरा होने पर राजा से कह देगा तो राजा उसे दंड दिए बिना नहीं मानेगा। अतः उसने भी मदनसेना को छोड़ दिया। लेकिन चोर को तो कोई डर नहीं था। वह तो गुप्तरूप से पहले ही पाप-कर्म में लगा हुआ था। उसने जो आभूषण सहित पाई हुई स्त्री को छोड़ दिया, इससे वही सच्चा त्यागी था। ’’

बेताल को अपने प्रश्न का सही उत्तर मिल गया। अतः वह पहले की भांति ही राजा के कंधे से फिसलकर वापस शिंशपा-वृक्ष की ओर उड़ गया। राजा भी अपना असीम धैर्य खोए बिना, उसे ले आने के लिए पुनः उस ओर चल पड़ा।

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ग्यारहवां बेताल: राजा धर्मध्वज की कथा

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ग्यारहवां बेताल

राजा धर्मध्वज की कथा

राजा विक्रमादित्य ने शिशपा-वृक्ष से पुनः बेताल को नीचे उतारा और उसे कंधे पर डालकर चल पड़ा। चलते हुए राजा के कंधे पर बैठे बेताल ने कहा—‘‘राजन, उस योगी के कहने में आकर सचमुच तुम बहुत परिश्रम कर रहे हो। तुम्हारे मार्ग का श्रम कुछ दूर हो इसलिए मैं तुम्हे यह कथा सुनाता हूं!’’

पुराने समय उज्जयिनी में धर्मध्वज नामक राजा राज करता था। उसकी तीन अत्यंत सुन्दर रानियां थीं, जो उसे समान रूप से प्रिय थीं। उन तीनों के नाम थे—इंद्रलेखा, तारावली और मृगांकवती। राजा उनके साथ रहकर सुखपूर्वक अपने राज्य का संचालन करता था।

एक बार जब बसंतकाल का उत्सव आया, तब वह राजा अपनी प्रियाओं के साथ क्रीड़ा करने के लिए उद्यान में गया। वहां उसने पुष्पों से झुकी हुई लताएं देखीं, जो कामदेव के धनुष जैसी लग रही थीं। उनमें गुन-गुन करते भौरों का समूह प्रत्यंचा के समान लगता था, जिसे मानो बसंत ने स्वयं ही सजाया हो।

ऐसे खूबसूरत वातावरण में राजा ने अपनी स्त्रियों के पीने से बची उस मदिरा को पीकर प्रसन्नता पाई, जो उनके निःश्वास से सुगंधित थी और उनके होंठों की तरह लाल थी। राजा ने खेल-ही-खेल में रानी इंद्रलेखा की चोटी पकड़कर खींची, जिससे उसके कानों पर से कमल का फूल खिसककर उसकी गोद में आ गिरा। उस फूल के आघात से उस कुलवती रानी की जांघ पर घाव हो गया और वह हाय-हाय करती हुई मूर्छित हो गई।

यह देखकर राजा और उसके अनुचर घबरा गए। राजा ने जल मंगवाकर रानी के मुंह पर पानी के छींटे मारे तो रानी होश में आई। अनन्तर, राजा उसे अपने महल में लाया और राजवैद्य से उसका उपचार करने को कहा। दो वैद्य तत्काल ही रानी के उपचार में जुट गए।

उस रात, इंद्रलेखा की हालत में सुधार देखकर राजा अपनी दूसरी पत्नी तारावली के साथ चंद्र-प्रासाद नामक महल में गया। वहां तारावली राजा की गोद में सो गई। उसके वस्त्र खिसक गए थे, जबकि उसके शरीर पर खिड़की की जालियों से होकर चंद्रमा की किरणें पड़ीं। किरणों का स्पर्श होते ही रानी तारावली जाग उठी और ‘हाय जल गई’ कहती हुई अचानक पलंग से उठकर अपने अंग मलने लगी। घबराकर राजा भी उठ बैठा। राजा ने तारावली के उस अंग पर सचमुच ही फफोले पड़ गए थे।

तारावली ने बताया—‘‘स्वामी नंगे शरीर पर पड़ी हुई चंद्रमा की किरणों ने मेरी

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यह हालत की है।'" तब राजा ने परिचारिकाएं बुलाई और उन्होंने रानी के लिए गीले कमल-पत्रों की सेज बिछाई एवं उसके शरीर पर चंदन का लेप लगाया। इसी बीच तीसरी रानी मृगांकवती भी जाग उठी। तारावली के कक्ष से आती आवाजें सुनकर उसकी नींद उचट गई थी। राजा के पास जाने की इच्छा से वह अपने कक्ष से निकलकर तारावली के कक्ष की ओर चल पड़ी। अभी वह कुछ ही कदम चली थी कि उसने दूर से किसी के घर धान कूटे जाने की आवाज सुनी। मूसल की आवाज सुनकर वह विकल हो उठी और 'हाय मरी' कहते हुए मार्ग में ही बैठ गई। परिचारिकाओं ने जब रानी की जांच की तो उन्होंने उसकी हथेलियों पर काले, गहरे धब्बे देखे। परिचारिकाएं दौड़ती हुई राजा के पास पहुंचीं और सारा वृत्तांत राजा को बताया। सुनकर राजा भी घबरा गया और तुरंत अपनी रानी की हालत देखने उनके साथ चल पड़ा।

रानी के पास पहुंचकर राजा धर्मध्वज ने उससे पूछा—"प्रिय ! यह क्या हुआ ?" तो आंखों में आंसू भरकर रानी मृगांकवती ने उसे अपने दोनों हाथ दिखाते हुए कहा—"स्वामी, मूसल की आवाज सुनने से मेरे हाथों में यह निशान पड़ गए हैं।" तब आश्चर्य और विषाद में पड़े राजा ने उसके हाथों पर दाह का शमन करने वाले चंदन आदि का लेप लगवाया।

राजा सोचने लगा—'मेरी एक रानी को कमल के गिरने से घाव हो गया, चंद्रमा की किरणों से दूसरी के अंग जल गए और इस तीसरी के हाथों में मूसल का शब्द सुनने से ही ऐसे निशान पड़ गए। हाय, दैवयोग से मेरी इन तीनों ही प्रियाओं का अभिजात्य गुण एक साथ ही दोष का कारण बन गया।' राजा ने वह रात बड़ी कठिनाई से काटी। सवेरा होते ही उसने राज्य भर के सभी कुशल वैद्यों और शल्य-क्रिया करने वालों को बुलवाया और अपनी रानियों का उपचार करने को कहा। उन वैद्यों और शल्यक्रिया जानने वालों के संयुक्त प्रयास से जब रानियां शीघ्र ही स्वस्थ हो गई तब राजा निश्चिंत हुआ।

यह कथा राजा को सुनाकर उसके कंधे पर बैठे हुए बेताल ने पूछा—"राजन, अब तुम यह बतलाओ कि इन तीनों रानियों में सबसे अधिक सुकुमारी कौन-सी थी ? जानते हुए भी यदि तुम मेरे इस प्रश्न का उत्तर न दोगे तो तुम पर पहले कहा हुआ शाप पड़ेगा।"

यह सुनकर राजा ने कहा—"बेताल ! उन सब में सबसे सुकुमारी थी रानी मृगांकवती। जिसने मूसल को छुआ भी नहीं, केवल उसकी आवाज से ही उसके हाथो मे दाग पड़ गए थे। बाकी दोनों को तो कमल एवं चंद्रकिरणों के स्पर्श से घाव तथा फफोले हुए थे। अतः वे दोनों उसकी बराबरी नहीं कर सकतीं।"

राजा ने जब बेताल को ऐसा सटीक उत्तर दिया तो बेताल संतुष्ट होकर पुनः उसके कधे से उतरकर उसी शिंशपा-वृक्ष की ओर चला गया। राजा विक्रमादित्य एक बार फिर उसे लाने के लिए उसी दिशा में चल पड़ा।

66 ▢ बेताल पच्चीसी

बारहवां बेताल: यशकेतु की कथा

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बारहवां वेताल

यशकेतु की कथा

इस बार भी वही क्रम चला। राजा विक्रमादित्य ने शिशपा-वृक्ष से बेताल को उतारा और उसे अपने कंधे पर डालकर ले चला। रास्ते में फिर से बेताल ने मौन भंग किया—‘‘राजन, तुम अपनी अनुद्विग्नता से मेरे प्रिय बन गए हो इसलिए सुनो, मै तुम्हारी प्रसन्नता के लिए तुम्हें यह रोचक कथा सुनाता हूं।’’

पुराने समय में अगदेश में यशकेतु नाम का एक राजा था। वह राजा महापराक्रमी था। अपने बाहुबल से वह बहुत-से राजाओं पर विजय प्राप्त कर चुका था।

उस राजा का एक मंत्री था, जो देवताओं के गुरु बृहस्पति के समान बुद्धिमान था। उसका नाम था दीर्घदर्शी। उस मंत्री के हाथों अपना राज्य निष्कंटक सौंपकर वह राजा केवल सुख-भोगों में ही आसक्त रहने लगा।

वह अधिकांशतः अन्तःपुर में ही रहता, कभी राजसभा में न आता। स्त्रियों के बीच रंगीले गीत सुनता, हितैषियों की बात न सुनता। निश्चिंत होकर वह रनिवास में ही रमा रहता था।

यद्यपि महामंत्री दीर्घदर्शी उसके राज्य का चिंता-भार वहन करता हुआ दिन-रात एक कर रहा था। फिर भी लोग इस तरह का अपवाद फैलाने लगे कि यशकेतु तो अब नाममात्र का राजा रह गया है। मंत्री उसे व्यसनों में डालकर स्वयं ही राज्यश्री का भोग कर रहा है।

लोगों के ऐसे विचार जानकर एक दिन मंत्री ने अपनी पत्नी मेघाविनी से कहा—‘‘प्रिये, यद्यपि राजा सुख-भोग में लिप्त है और मैं उसका कार्यभार वहन कर रहा हूं, तथापि लोग ऐसा अपवाद फैला रहे हैं कि मैं उसका राज्य हड़प रहा हूं। जनापवाद झूठा भी हो, तो भी वह बड़ा हानिकारक होता है। जनापवाद के कारण ही भगवान राम द्वारा सीता को त्यागना पड़ा था। अतः तुम मुझे सलाह दो कि ऐसी अवस्था में मुझे क्या करना चाहिए?’’

अपने स्वामी की परेशानी जानकर उस धीर स्वभाव और अपने नाम के अनुकूल आचरण करने वाली मेघाविनी ने कहा—‘‘महामति ! युक्तिपूर्वक राजा से पूछकर आपको तीर्थयात्रा के बहाने कुछ समय के लिए विदेश चले जाना चाहिए। इस प्रकार निःस्पृह होने के कारण आपके बारे में जो लोकापवाद फैल रहा है, वह मिट जाएगा और आपके न रहने पर राजा भी स्वयं अपना राज-काज देखने लगेंगे। उसके बाद धीरे-धीरे उनके व्यसन भी दूर हो जाएंगे। फिर जब आप लौटकर आएंगे और मंत्री का पद संभालेंगें, तब आपको कोई दोष न देगा।’’

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पत्नी के ऐसा कहने पर मंत्री बोला—‘‘तुमने ठीक कहा, प्रिये। मैं बिल्कुल ऐसा ही करूंगा।’’

तब वह राजा के पास गया और बातों-ही-बातों में उसने राजा से कहा—‘‘राजन, आप मुझे कुछ दिनों के लिए छुट्टी दे दें, जिससे मैं तीर्थयात्रा पर जा सकूं क्योंकि धर्म में मेरी बहुत आस्था है।’’

यह सुनकर राजा ने कहा—‘‘ऐसा मत करो मंत्रिवर। तीर्थयात्रा के बिना भी, घर में रहते हुए दान आदि करके तुम पुण्यफल प्राप्त कर सकते हो।’’

मंत्री बोला—‘‘दान आदि के द्वारा तो अर्थ शुद्धि ही पाई जा सकती है, राजन। किंतु तीर्थों से अनश्वर शुद्धि प्राप्त होती है. अतः बुद्धिमान लोगों को चाहिए के वे यौवन के रहते हुए ही तीर्थयात्रा कर लें। शरीर का कोई भरोस नहीं है। समय बीत जाने पर फिर तीर्थयात्रा कैसे हो सकती है?’’

मंत्री जब इस प्रकार राजा को समझाने का प्रयास कर रहा था, तभी प्रतिहारी वहां पहुंचा और राजा से बोला—‘‘स्वामी, दोपहर का समय हो चुका है, अतः आप उठकर स्नान कर लें क्योंकि स्नान का समय बीता जा रहा है।’’

यह सुनते ही राजा स्नान के लिए उठकर खड़ा हो गया। यात्रा के लिए तैयार मंत्री भी उसे प्रणाम करके वहां से चला आया।

मंत्री ने घर आकर जैसे-तैसे अपनी पत्नी को मनाया क्योंकि वह स्वयं भी उसके साथ चलने का आग्रह कर रही थी। फिर वह अकेला ही यात्रा के लिए चल पड़ा। अनेक देशों में घूमता हुआ और तीर्थों की यात्रा करता हुआ वह मंत्री पौंड्र देश में जा पहुंचा।

उस देश के एक नगर में समुद्र किनारे एक शिव मंदिर था। दीर्घदर्शी उस मंदिर में पहुंचा और वहां मंदिर के आंगन में बैठकर श्रम की थकान दूर करने लगा। वहां देवताओं के पूजन के लिए आए हुए निधिदत्त नामक एक वणिक ने दीर्घदर्शी को देखा, जो दूर से आने के कारण धूल से भरा हुआ था और कड़ी धूप के कारण कुम्हला गया था।

मंत्री को ऐसी अवस्था में यज्ञोपवीत पहने एवं उत्तम लक्षणों वाला देखकर वणिक ने उसे कोई श्रेष्ठ ब्राह्मण समझा और सत्कारपूर्वक उसे अपने घर ले आया। घर ले जाकर उस वणिक ने मंत्री को स्नान कराया। उत्तम भोजन आदि से सत्कार करने के बाद जब वह विश्राम कर चुका तो उससे पूछा—‘‘श्रीमंत, आप कौन हैं? कहां के रहने वाले हैं और कहां जा रहे हैं?’’

तब दीर्घदर्शी ने उससे गंभीरतापूर्वक कहा—‘‘मैं एक ब्राह्मण हूं और तीर्थ यात्रा करता हुआ यहां आया हूं।’’ तब व्यापारी निधिदत्त ने दीर्घदर्शी से कहा—‘‘हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मैं व्यापार करने के लिए सुवर्णद्वीप जाने वाला हूं। इसलिए तुम मेरे घर में तब तक ठहरो, जब तक कि मैं लौटकर नहीं आ जाता। तुम तीर्थ यात्रा से थके हुए हो, यहां रहकर विश्राम भी कर लोगे।’’

68 ☐ बेताल पच्चीसी