बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट
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Read in contextराजकुमारी को, जो उसके अंगों से थोड़ा सटी हुई थी और भय, प्रीति एवं लज्जा से
व्याकुल हो रही थी, मनःस्वामी हाथी की पहुंच से बाहर, उसे बहुत दूर ले गया।
जब उसके रक्षक निकट आए तो उन्होंने मनःस्वामी की बहुत प्रशंसा की ओर
राजकुमारी को उसके महल में ले गए। जाती हुई राजकुमारी बार-बार पलटकर
मनःस्वामी को देखती जाती थी।
अपने महल में विकल होकर, वह अपने प्राणरक्षक का स्मरण करती हुई
कामाग्नि में दिन-रात जलती हुई-सी रहने लगी।
राजकुमारी अपने अन्तःपुर में चली गई, यह देखकर मनःस्वामी भी उस उद्यान
से लौट आया और उत्कंठित होकर सोचने लगा—‘‘इसके बिना अब मुझमें जीने का
उत्साह नहीं रह गया। अतः वह अपने सिद्ध और धूर्त गुरु मूलदेव के पास पहुंचा।
मूलदेव अपने शशि नामक एक मित्र के साथ रहता था। उन्होंने माया के अद्भुत
मार्ग सिद्ध कर लिए थे। अतः उन्हें मायावी शक्तियों का बहुत ज्ञान था। मनःस्वामी
ने उनके पास जाकर जब अपनी समस्या बताई तो मूलदेव ने उसे पूरा करने का
आश्वासन दे दिया।
अनन्तर, धूर्त शिरोमणि उस मूलदेव ने अपने मुंह में एक मंत्र सिद्ध गोली डाल
ली और अपने को एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में बदल लिया। एक दूसरी गोली उसने
मनःस्वामी के मुंह में डालने को दी, जिससे वह एक सुन्दर कन्या बन गया।
मूलदेव मनःस्वामी को लेकर उस राजकुमारी के पिता के पास पहुंचा और उसके
पिता से बोला—‘‘राजन ! मेरा एक ही पुत्र है। मैं उसके लिए दूर से मांगकर इस
कन्या को लाया हूं किंतु इसी बीच मेरे पुत्र न जाने कहां चला गया है। मैं उसे ढूंढ़ने
के लिए जा रहा हूं। अतः इस कन्या को आप अपने पास रख लें। आपके विश्वास
पर, इसे आपके आश्रय में रखकर, मैं अपने पुत्र को ढूंढ़कर ले आऊंगा। ’’
यह सोचकर कि इन्कार करने पर कहीं यह सिद्ध पुरुष क्रुद्ध होकर कोई शाप न
दे दे, राजा यशःकेतु ने उसकी बात स्वीकार कर ली और अपनी कन्या शशिप्रभा को
बुलाकर कहा—‘‘बेटी ! तुम इस कन्या को अपने महल में ही रखना और इसका हर
तरह से ख्याल रखना। इसे किसी भी वस्तु की आवश्यकता हो, उसे भली-भांति पूर्ण
करना।’’
राजकुमारी ने अपने पिता की आज्ञा शिरोधार्य की और वह कन्या बने
मनःस्वामी को अपने राजमहल में ले गई।
महल में आई इस कन्या के साथ राजकुमारी थोड़े ही दिनों में हिल-मिल गई और
उस पर सखियों जैसी प्रीति तथा विश्वास करने लगी। एक बार, रात के समय जब
कन्या के वेश में अपने को छिपाए हुए मनःस्वामी राजकुमारी की शय्या के निकट ही
एकान्त में सोया हुआ था, तब उसने विरह से व्याकुल राजकुमारी से, जो अपनी सेज
पर छटपटा रही थी, पूछा—‘‘सखी, तुम्हारी कान्ति पीली पड़ गई है, तुम
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