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बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

Page 42 of 151

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सौभाग्य और सतीत्व की अधिष्ठात्री हो। तुम अपने पति कामरिपु (शिव) के अर्ध
शरीर में निवास करती हो, तुम संसार की सभी स्त्रियों की शरणदायिनी हो ! तुम
दुखों का नाश करने वाली हो। फिर तुमने मेरे पति और भाई को मुझसे क्यों छीन
लिया ? मै तो सदा तुम्हारी ही भक्ति करती रही हूं। मेरे प्रति तुम्हारा यह कार्य
उचित नहीं है। हे मां, मैं तुम्हारी शरण में आई हूं अतः तुम मेरी प्रार्थना सुनो।
दुर्भाग्य से लुटे हुए इस शरीर का अब मै त्याग करती हूं। अगले जन्म में मैं जब भी,
जहां भी जन्म लूं, पति व भाई के रूप में मुझे ये ही दोनों प्राप्त हों।"

इस प्रकार स्तुतिपूर्वक देवी से निवेदन करके उसने उन्हें पुनः प्रणाम किया और
लताओं के द्वारा अशोक वृक्ष पर एक फंदा तैयार किया। फंदे को फैलाकर ज्योंही उसने
अपने गले मे डाला, त्योंही आकाशवाणी हुई—'बेटी, ऐसा दुस्साहस मत करो।
अल्पव्यस्का होकर भी तुमने जो इतना साहस दिखलाया है, उससे मै प्रसन्न हूं! फंदा हटा
दो। तुम अपने पति और भाई के शरीरों पर उनके सिर जोड़ दो। मेरे वर से ये दोनों
जीवित हो जाएंगे।"

यह सुनकर मदनसुन्दरी प्रसन्नता से अधीर हो गई। उसने अपने गले से फंदा
निकाल दिया और घबराहट में बिना विचारे, उसने पति का सिर भाई के शरीर पर
और भाई का सिर पति के धड़ पर जोड़ दिया।

तब देवी के वरदान से वे दोनों जीवित उठ खड़े हुए। उनके शरीर में कहीं
कटने-फटने के निशान भी नहीं थे, लेकिन सिरों के बदल जाने से उनके शरीरों में संकरता
आ गई थी।

अनन्तर, उन दोनों ने एक-दूसरे को अपनी-अपनी कथा सुनाकर प्रसन्नता प्राप्त
की। उन्होंने भगवती गौरी को प्रणाम किया और फिर तीनों अपने इष्ट स्थानों की
ओर चल पड़े।

राह में जाती हुई मदनसुन्दरी ने देखा कि उसने उनके सिरो की अदला-बदली कर
दी है, तब वह घबरा गई और समझ न सकी कि उसे क्या करना चाहिए।

इतनी कथा सुनाकर बेताल ने राजा विक्रम से पूछा—"राजन, अब तुम यह
बतलाओ कि शरीरों के इस प्रकार मिल जाने पर उसका पति कौन हुआ ? जानते हुए
भी यदि तुम न बतलाओगे तो तुम पर पहले कहा हुआ शाप पड़ेगा।"

तब बेताल के इस प्रश्न का उत्तर विक्रमादित्य ने इस प्रकार दिया—'हे बेताल,
उन दोनों में से जिस शरीर पर उसके पति का सिर था, वही उसका पति है। क्योंकि
सिर ही अंगों में प्रधान है और उसी से मनुष्य की पहचान होती है।

राजा के इस प्रकार सही उत्तर देने पर बेताल उसके कंधे से उतरकर चुपचाप चला
गया। राजा भी अपनी उत्तर देने की भूल स्वीकार करते हुए पुनः उसे पाने के लिए
शिंशपा-वृक्ष की ओर चल पड़ा।

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