बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in context२४ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ब्रह्मचारिधर्माः
उपसंग्रहणवेलायां च स्वश्रोत्रसंस्पर्शः कर्तव्यः चित्तसमाधानार्थम् । तत्र मन्त्रः—'असावहं भोः' इति । अस्मीति वाक्यसमाप्तिः । असावित्यात्मीयनाम-ग्रहणम् । 'गोविन्दशर्मा नामाऽस्मीति प्रयोगः ॥ २७ ॥
पादयोः कियान् देश उपसंग्राह्य इत्यत आह—
^२अधस्ताज्जान्वोरा पद्ध्याम् ॥ २८ ॥
अनु०—( पैरों का कितना भाग स्पर्श करे इस विषय में नियम है कि ) घुटनों से नीचे पैरों तक के भाग का स्पर्श करना चाहिए ॥ २८ ॥
उपसंगृह्णीयादिति शेषः ॥ २८ ॥
तत्राऽपवादमाह—
नाऽऽसीनो नाऽऽसीनाय न शयानो न शयानाय नाऽप्रयतो नाऽप्रयताय ॥ २९ ॥
अनु०—ब्रह्मचारी बैठे हुए अथवा बैठे हुए गुरु को, स्वयं लेटे हुए या लेटे हुए गुरु को, स्वयं अपवित्र रहने पर या गुरु के अपवित्र रहने पर प्रणाम न करे ॥ २९ ॥
उपसंगृह्णीयादित्यनुवर्तते । अप्रयतोऽशुचिः ॥ २९ ॥
^३काममन्यस्मै साधुवृत्ताय गुरुणाऽनुज्ञातः ॥ ३० ॥
अनु०—ब्रह्मचारी यदि चाहे तो गुरु की आज्ञा से अन्य उत्तम आचरण वाले विद्वान् के चरणों का भी स्पर्श कर सकता है ॥ ३० ॥
टि०—प्रायः सभी पुस्तकों में यह सूत्र ऊपर के सूत्र २६ के अंश के रूप में आया है, किन्तु टीका के आधार पर इसे ३० वें सूत्र के स्थान पर रखा गया है । द्रष्टव्य-पाद टिप्पणी ।
गुरोरन्यस्मै साधुवृत्ताय अनुष्ठानपराय विदुषे गुर्व्वनुज्ञया तत्सन्निधाव-प्युपसंगृह्णीयात् । कामग्रहणात्निवृत्तिरपि प्रतीयते । असन्निधौ तु बिनाऽप्यनु-ज्ञया कुर्यादेव ॥ ३० ॥
१. अत्र ग्रन्थकर्ता प्रयोगप्रदर्शनव्याजेन स्वनाम निर्दिशति ।
२. 'सकुष्ठिकमुपसंगृह्णीयात्' इत्यापस्तम्बः । सगुल्फमित्यर्थः । १५. २१.
३. सूत्रमिदं २६ सूत्रानन्तरमेव पठितं सर्वेष्वपि मूलपुस्तकेषु । व्याख्यानपुस्तकेषु तु सर्वत्राऽत्रैव पठितमुचितं च ।