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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

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DevanagariHindipublished486 pages

Page 67 of 486

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Page 67

द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १५

मात्रस्य। सा च 'य इन्द्रियकामो वीर्यकामस्स्या'दित्यत्र विहिता। अनाहिता-
ग्नेस्तु वक्ष्यति—'प्रतिषिद्धदेशगमन' इति ॥ १५ ॥

पुनरप्याहिताग्नेरेव देशान्तरगमने प्रायश्चित्तमाह—

अथाऽप्युदाहरन्ति—

पद्भ्यां स कुरुते पापं यः कलिङ्गान् प्रपद्यते ।
ऋषयो निष्कृतिं तस्य प्राहुर्वैश्वानरं हविः ॥ १६ ॥

अनु०—इसी विषय में एक और गाथा कही जाती है—जो कलिङ्ग देश की यात्रा करता है वह पैरों से पाप करता है, उसके प्रायश्चित्त के लिए ऋषियों ने वैश्वानरी इष्टि का विधान किया है ॥ १६ ॥

टि०—कलिङ्गगमन के लिए १५ के अन्तर्गत उद्धृत गाथा में पुनस्तोम या सर्वपृष्ठ इष्टि का प्रायश्चित्त बताया गया है, उसका अन्य विकल्प वैश्वानरी इष्टि भी है । गोविन्दस्वामी ने एक विशिष्टता प्रदर्शित की है कि आरट्ट आदि में न केवल प्रवेश के लिए अपितु वहाँ के लोगों के साथ बोलने, उठने-बैठने के लिए भी प्रायश्चित्त करना होता है, किन्तु कलिग में यात्रामात्र के लिए ही प्रायश्चित्त करना होता है ।

वैश्वानरं हविः वैश्वानरेष्टिः । एषा च कलिङ्गगमने सर्वपृष्ठया सह विकल्प्यते । अथ वा—आरट्टादिषु न गमनादेव प्रायश्चित्तं किं तर्हि सम्भाषण-सहासनादिभिरपि । कलिङ्गे पुनर्गमनमात्रमिति विशेषः ॥ १६ ॥

अथाऽप्याह—

बहूनामपि दोषाणां कृतानां दोषनिर्णये ।
पवित्रेष्टिं प्रशंसन्ति सा हि पावनमुत्तममिति ॥ १७ ॥

अनु०—अनेक दोषों या पापों के करने पर दूर करने के लिए पवित्रेष्टि की ही प्रशंसा की गयी हैं ? वही सर्वाधिक पवित्र करनेवाली इष्टि है ।

निर्णये नितरां नये अपनोदने । पवित्रेष्टिश्च यज्ञप्रायश्चित्तेषु प्रसिद्धा ॥१७॥

अथैतत्प्रसङ्गादाह—

'वैश्वानरीं व्रातपतीं पवित्रेष्टिं तथैव च ।


१. वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् ( तै. सं. २.२.६ ) इति विहितेष्टिर्वैश्वानरी । अग्नये व्रतपतये पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपेद्य आहिताग्निसन्नव्रत्यमिव चरेत्