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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

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DevanagariHindipublished486 pages

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Page 56
४बौधायन-धर्मसूत्रम्[ परिषद्

स्येति येषां दर्शनमिति विग्रहः । अनेन मीमांसकाः कीर्तिताः । अत एव तदनुमानज्ञास्ते भवन्ति स्मार्तशिष्टागमयोश्चैत्यनुमानविद् इत्यर्थः । एवं च शाखाधिगतो यो धर्मस्सोऽनुष्ठेय इत्यभिप्रायः ॥ ६ ॥

तदभावे दशावरा परिषत् ॥ ७ ॥

अनु०—उपर्युक्त लक्षण वाले शिष्टजनों के न होने पर कम से कम दस सदस्यों की परिषत् धर्म का निर्णय करने में प्रामाणिक होती है ॥ ७ ॥

उक्तलक्षणशिष्टाभावे दशावरा परिषत् ; तया यो विधीयते सोऽनुष्ठेय इत्यर्थः ॥ ७ ॥

तच्च परकीयमतेन । स्वमतं प्रदर्शयितुमाह—

अथाप्युदाहरन्ति—
चातुर्वैद्यं विकल्पी च अङ्गविद्धर्मपाठकः ।
आश्रमस्थास्त्रयो विप्राः पर्षदैषा दशावरा ॥ ८ ॥

अनु०—इस विषय में भी यह पद्य उद्धृत किया जाता है—
चार वेदों को जानने वाले चार व्यक्ति, एक विकल्पी अर्थात् मीमांसक, वेद के अङ्गों (व्याकरणादि) का ज्ञाता, धर्मशास्त्र का पाठ करने वाला (अर्थात् धर्मशास्त्र का अर्थ जानने वाला), तीन विभिन्न आश्रमों के तीन ब्राह्मण—इनकी दस सदस्यों वाली परिषत् होती है ॥ ८ ॥

टिप्पणी—चार व्यक्तियों में प्रत्येक एक-एक वेद का ज्ञाता होता है । तीन विभिन्न आश्रमों के ब्राह्मणों ‘आश्रमस्थास्त्रयो विप्राः’ के विषय में टीकाकार गोविन्द स्वामी का मत है कि वानप्रस्थी वन में निवास करने के कारण परिषद् में नहीं आ सकता । परिव्राजक भिक्षा के लिए ग्राम में आता जाता रहता है, इसी प्रकार नैष्ठिक ब्रह्मचारी भी परिषत् में लिया जा सकता है । "चाश्रमस्थास्त्रयो मुख्याः" भी पाठ है ।

चतस्र एव विद्याश्चातुर्वैद्यं तेन तद्विदो लक्ष्यन्ते । विकल्पी मीमांसकः । अङ्गं व्याकरणादि तज्ज्ञः । धर्मपाठकः तन्मूलिका तदर्थावगतिरिति पाठग्रहणम् । तदभिज्ञ इत्यर्थः । तान् विशिनष्टि—आश्रमस्थास्त्रयो विप्राः अवानप्रस्थास्त्रयो गृह्यन्ते । वानप्रस्थानां पुनर्वनाधिवासत्वादनधिकारो धर्मोपदेशस्य । परिव्राजकोऽपि भिक्षार्थी ग्राममियादेव । तथा च गौतमः—'प्रागुपोत्तमात्रय आश्रमिणः' इति । विप्रा इति क्षत्रियवैश्ययोर्धर्मोपदेशानधिकारप्रदर्शनार्थं विप्रग्रहणम् । 'ब्राह्मणो धर्मान् प्रब्रूयात्' इति वसिष्ठवचनाच्च । 'आश्रमस्था-