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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 461 of 486

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Page 461

अष्टमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने अष्टमोऽध्यायः ४०७

देववन्मोदते भूयस्स्वर्गलोकेऽपि पुण्यकृत् ॥ १२ ॥

**अनु०—**उस व्यक्ति के पृथ्वी पर रहने पर भी स्वर्ग में रहने वाले देवता उसे पुण्यकर्मा के रूप में जानने लगते हैं। वह पुण्य करने वाले पुनः स्वर्गलोक में देवों के समान सुखों का भोग करता है ॥ १२ ॥

द्युस्थैर्देवैर्भमिष्ठोऽपि पुण्यकर्मेति ज्ञायते । तथा च श्रुतिः—'यथा वृक्षस्य सम्पुष्पितस्य दूराद्गन्धो वात्येवं पुण्यस्य कर्मणो दूराद्गन्धो वाति' इति ॥१२॥

^२सर्वपापार्णमुक्तात्मा क्रिया आरभते तु याः ।
अयत्नेनैव तास्सिद्धिं यान्ति शुद्धशरीरिणः १३ ॥

**अनु०—**सभी पापों और ऋणों से मुक्त व्यक्ति जिन क्रियाओं को आरम्भ करता है, उस शुद्ध शरीर वाले व्यक्ति की वे सभी क्रियाएं बिना परिश्रम के ही स्वयं सिद्ध हो जाती हैं ।

. प्राजापत्यमिदं पुण्यं^३मृषीणां समुदीरितम् ।
इदमध्यापयेन्नित्यं धारयेच्छृणुतेऽपि वा ॥ १४ ॥ *
मुच्यते सर्वपापेभ्यो ब्रह्मलोके महीयते ॥

**अनु०—**यह प्रजापति का पवित्र धर्मशास्त्र है जिसका उपदेश ऋषियों ने किया है। इसका नित्य अध्ययन और अध्यापन करे' इसका स्मरण करे। इसको सुनने से भी मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है और ब्रह्मा के लोक में प्रतिष्ठित होता है ॥ १४ ॥

इदमिति धर्मशास्त्रमुच्यते । गणहोममात्रमेव वेत्यर्थः । अत्राऽध्यापनधारणश्रवणानां पूर्वं पूर्वं गरीयः ॥ १३, १४ ॥

अथ मन्त्रपुरश्चरणमाह—
यान् सिषाधयिषुर्मन्त्रान् द्वादशाऽहानि तान् जपेत् ॥ १५ ॥
घृतेन पयसा दध्ना प्राश्य निश्योदनं सकृत् ।

**अनु०—**जिन मन्त्रों से अपनी इच्छाओं को सिद्ध करना चाहता हो उनका


^२ सर्वपापविशुद्धात्मा इति ग पु. ^३ ऋषिभिः ऋषिणा इति क. इ. पु.
* 'इदमेतद्गणं होमं धारयेदथ वा जपेत् ॥ १५ ॥
शृणोतु वा विधिं स्मृत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥ इत्यधिकः सूत्रपाठः क. पु.