बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in contextषष्ठः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ३९५
अनु०—यह जो दूसरी अत्यन्त गोपनीय विधि बतायी जा रही है उसे भी ध्यान देकर समझो । इस विधि से व्यक्ति बड़े पातक दोष को छोड़कर अन्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। पवित्र क.रने वाले मन्त्रों से (सुरभिमती आदि मन्त्रों से ) जल का मार्जन करते हुए, रुद्र के ग्यारह अनुवाकों का जप करते हुए, पवित्र मन्त्रों के उच्चारण के साथ घृत की आहुति करते हुए तथा सुवर्ण, गो तथा तिल का दान कर मनुष्य बड़े पातक के दोष को छोड़कर अन्य सभी पापों से मुक्त होता जाता है ॥ ३-४ ॥
टि०--गोविन्दस्वामी की व्याख्या के अनुसार यहाँ भी सात दिन-रात्रि की अवधि समझनी चाहिए ।
अल्पप्रयासेन बहुपापक्षयलाभात् गुह्यमित्युक्तम् । प्रथमस्सर्वशब्द एकैकस्मिन् पापाभ्यासार्थः । द्वितीयः पापभेदापेक्षः । पवित्राणि 'सुरभिमत्यादयो मन्त्राः । रुद्रैकादशिका 'नमस्ते रुद्र' इत्येकादशाऽनुवाकाः । पूर्वं जपन् जुह्वत् प्रयच्छन् मुच्यत इति सम्बन्धः । अत्राऽपि वक्ष्यमाणस्सप्तरात्रः कालो भवति ॥ ३, ४ ॥
योऽश्नीयाद्यावकं पक्वं गोमूत्रे सशकृद्रसे ।
सदधिक्षीरसर्पिष्के मुच्यते ऽसोंऽहसः क्षणात् ॥ ५ ॥
अनु०—जो व्यक्ति गाय की मूत्र, गोबर के रस, दधि, दूध, घृत से मिश्रित पके हुए यावक का भक्षण करता है वह शीघ्र ही पाप से मुक्त हो जाता है ॥ ५ ॥
प्रसूतो यश्च शूद्रायां येनाऽगम्या च लङ्घिता ।
सप्तरात्रात्प्रमुच्येते विधिनेतेन तावुभौ ॥ ६ ॥
अनु०—जिस व्यक्ति ने शूद्रा स्त्री से पुत्र उत्पन्न किया है, जिस व्यक्ति ने ऐसी स्त्री से मैथुन किया है, जिससे मैथुन करना वर्जित है-वे दोनों ही प्रकार के दोषी व्यक्ति उपर्युक्त विधि से सात दिन में पाप से मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥
यावकं पक्वं यवौदनो यवागूर्वा । शकृद्रसोऽपि गोरेव । तत्सहिते गोमूत्रे पक्वमित्यर्थः । तदेव दध्ना क्षीरेण सर्पिषा च संयुक्तं भवति । प्रसाङ्गात्पापं तद्वक्ष्यमाणम्-प्रसूतो यश्चेत्यादि । सप्तरात्रादिति कालनिर्देशविरोधात् क्षणादित्ययमर्थवादः । सप्तरात्राभिप्रायो वा । 'क्षणः क्षणोतेः प्रक्ष्णतः कालः' इति निर्वचनात् । क्रमोढायामपि शूद्रायामपत्योत्पादनं यः करोति
१. 'दधिक्राव्ण' इति सुरभिमती । तस्या सुरभिशब्दश्रवणात् ॥