बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in contextतृतीयः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः ३७७
अनु०—पहली बार आचमन करने पर ऋग्वेद को प्रसन्न करता है, दूसरी बार आचमन करने पर यजुर्वेद को और तीसरी बार आचमन करने पर सामवेद को प्रसन्न करता है । पहली बार ओठों को पोछने पर अथर्ववेद को प्रसन्न करता है, दूसरी बार पोंछने पर इतिहास-पुराण को प्रसन्न करता है । जब बायें हाथ को पोंछता है, पैर, सिर, हृदय, नासिका, दोनों नेत्रों, दोनों कानों, नाभि का स्पर्श करता है, उससे ओषधियों, वनस्पतियों, सभी देवों को प्रसन्न करता है, इस कारण आचमन द्वारा ही वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ३-५ ॥
'इतिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम्' इति श्रुतिः। ऋग्वेदाद्यभिमानिन्यो देवताः प्रीता भवन्त्याचमननेनैवाप्नोति ताः देवताः। ननु कथमेतदाचमनं भवति ? नाऽयं पर्यनुयोगस्य विषयः, नहि वचनस्याऽतिभारोऽस्तीत्युक्तत्वात् । यथाऽऽस्यगतेन सुराविन्दुना पतितः, न पयोविन्दुना, तदपि हि वचनावगम्यमेव, तस्माददोषः ॥ ४ ॥
अष्टौ वा समिध आदध्यात्—"देवकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा मनुष्यकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा। पितृकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा। आत्मकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा। यद्दिवा च नक्तं चैनश्चकृम तस्याऽवयजनमसि स्वाहा। यत्स्वपन्तश्च जाग्रतश्चैनश्चकृम तस्याऽवयजनमसि स्वाहा। यद्विद्वांसश्चाविद्वांसश्चैनश्चकृम तस्याऽवयजनमसि स्वाहा। एनस एनसोऽवयजनमसि स्वाहे"ति ॥ ६॥
एतैरष्टाभिर्हुत्वा सर्वस्मात्पापात्प्रमुच्यते ॥ ७ ॥
अनु०—अथवा निम्नलिखित आठ मन्त्रों से अग्नि पर आठ समिध् रखे तुम देवों के पापों को दूर करने वाले हो, स्वाहा। मनुष्य कृत पाप को दूर करने वाले हो, स्वाहा ! पितृकृत पाप को दूर करने वाले हो, स्वाहा। मेरे किए हुए पाप को दूर करनेवाले हो, स्वाहा। मैंने दिन में और रात में जो पाप किए है उसको दूर करनेवाले हो स्वाहा। मैंने सोते हुए, जागते हुए जो पाप किए हैं उस को दूर करनेवाले होस्वाहा। मैंने जानबूझकर और अनजाने में जो पाप किया है उसको तुम दूर करने वाले हो, स्वाहा। तुम प्रत्येक पाप को दूर करने वाले हो, स्वाहा। इन आठ मन्त्रों से हवन कर सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ६-७ ॥
अवयजनं निरसनम् ॥ ६, ७ ॥
१. महानारायणोपनिषद्गता इमेऽष्टौ मन्त्राः। अत्रापि द्राविडपाठ एव स्वीकृतस्सूत्रकारेण See. तै. आ, १०. ५९. ॥