बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in contextद्वितीयः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३७५
अनु०— यहाँ निम्नलिखित उद्धृत करते हैं—
न खाने योग्य अन्न खा लेने पर, अपेय पदार्थ का पानकर लेने पर अथवा निषिद्ध अन्न खाने पर, निषिद्ध कर्म करने पर या प्रतिषिद्ध क्रिया का अनुष्ठान करने पर, जान बूझकर भी पातकों के समान दोषों से और सभी पातकों से भी शुद्धि हो जाती है ॥ १४ ॥
अविशुद्धधर्माचरिते इति पदच्छेदः। छद्मना चरित इत्यर्थः। पातकोपमानि 'अनृतं च समुत्कर्षवति' इत्येवमादीन्येकविंशतिः। सर्वपातकरिति प्रशंसा-र्थमुक्तम्। न पुनः प्रायश्चित्तमेतत् ॥ १४ ॥
त्रिरात्रं वाऽप्युपवसन् त्रिरह्नोऽभ्युपेयादपः ।
प्राणानात्मनि संयम्य त्रिः पठेद्घमर्षणम् ॥ १५ ॥
अनु०— तीन दिन और तीन रात्रि उपवास करे, दिन में तीन बार स्नान करे और प्राणवायु को रोक कर तीन बार अघमर्षण मन्त्र का जप करे ॥ १५ ॥
अनन्तरोक्तेन विकल्पः। त्रिरात्रं त्रिषवणं स्नानम् ॥ १५ ॥
एतस्यैव विशेष उच्यते —
'यथाऽश्वमेधावभृथ एवं तन्मनुरब्रवीत् ॥ १६ ॥
अनु०— जिस प्रकार अश्वमेध यज्ञ के अन्त का अवभृथ स्नान होता है उसी प्रकार उपर्युक्त प्राणायाम और अघमर्षण मन्त्र का जप भी है ॥ १६ ॥
विज्ञायते च—
^२चरणं पवित्रं विततं पुराणं येन पूतस्तरति दुष्कृतानि ।
तेन पवित्रेण शुद्धेन पूता अतिपाप्मानमरातिं तरेमेति ॥ १७ ॥
इति चतुर्थप्रश्ने द्वितीयः खण्डः ॥
अनु०— ऐसा ज्ञात है—यह अघमर्षण सूक्त पाप को हटाने वाला, पवित्र करने वाला, विस्तीर्ण और प्राचीन है। उस पवित्र और शुद्ध करने वाले अघमर्षण सूक्त से पवित्र होकर हम भी अपने शत्रु पाप को जीते ॥ १७ ॥
चरणं चलनं पापस्य पवित्रं पवनहेतुः विततं विस्तीर्णं सर्वशास्त्रेषु पुराणं पुरातनं तदेतदघमर्षणसूक्तम् । तदावेष्टयति—येन सूक्तेन पूतो मनुष्यस्तरति दुष्कृतानि पपानि। वयमपि तेन पूताः पाप्मानं शत्रुमत्तितरमेति प्रार्थना ॥ १६ ॥ १७ ॥
इति चतुर्थप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ॥
१ See मनु. १२. २० ९. : ६०.
२. महानारायणोपनिषदि पठितोऽयं मन्त्रः See. तै. आ. १०. ११