बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in contextद्वितीयः खण्डः] चतुर्थप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३७३
वारुणीभिरुपस्थाय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ९ ॥ इति ।
अनु०— किन्तु यदि उसने निषिद्ध कर्मों का बार-बार आचरण किया है तो वारुणी मन्त्रों से पूजा करके सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ९ ॥
अध्यस्य निश्चित्य । अपिशब्दात् कृत्वा च । प्रतिषिद्धाचाराः भस्मकेशादि-व्यवस्थानादायः । उपस्पर्शनमुदकाञ्जलिन शिरस्यभिषेकः ॥ ९ ॥
अथाऽवकीर्ण्यमावास्यायां निश्यग्निमुपसमाधाय दार्विहोमिकीं परिचेष्टां कृत्वा द्वे आज्याहुती जुहोति "कामावकीर्णोऽस्म्यवकीर्णोऽस्मि काम कामाय स्वाहा । कामाभिद्रुग्धोऽस्म्यभिद्रुग्धोऽस्मि काम कामाय स्वाहे"ति ॥ १० ॥
हुत्वा प्रयताञ्जलिः कवातिर्यङ् ङग्निमुपतिष्ठेत—"सं मा सिञ्चन्तु मरुतस्सम्मिन्द्रस्सं बृहस्पतिः । सं माऽयमग्निस्सिञ्चत्वायुषा च बलेन चाऽऽयुष्मन्तं करोतु मे"ति । प्रति हाऽस्मै मरुतः प्राणान् दधाति प्रतीन्द्रो बलं प्रति बृहस्पतिर्ब्रह्मवर्चसं प्रत्यग्निरितरत्सर्वं सर्वतनुर्भूत्वा सर्वमायुरेति । त्रिराममन्त्रयेत । त्रिसत्या हि देवा इति विज्ञायते ॥ ११ ॥
अनु०— ब्रह्मचर्य व्रत को भंग करने वाला ब्रह्मचारी अमावस्या की रात्रि की अग्नि का उपसमाधान करे और दार्विहोम की आरम्भिक क्रियाएं कर निम्नलिखित मन्त्रों से घृत की दो आहुतियों से हवन करे "कामावकीर्णोऽस्म्यवकीर्णोऽस्मि काम कामाय स्वाहा। कामाभिद्रुग्धोऽस्म्यभिद्रुग्धोऽस्मि काम कामाय स्वाहा।" (काम, मैंने व्रत का भंग किया है, मैं अवकीर्णी हूँ, काम के लिए स्वाहा। काम, मैं ने दुष्कर्म किया है, मैं दुष्कर्मी हूँ काम को स्वाहा) ॥ १० ॥
अनु०— हवन करने के बाद अञ्जलि बांधकर कुछ तिरछे बैठकर निम्नलिखित मन्त्र से अग्नि की आराधना करे—'सं मा सिञ्चन्तु मरुतस्सम्मिन्द्रस्सं बृहस्पतिः। सं माऽयमग्निसिञ्चत्वायुषा च बलेन चाऽऽयुष्मन्तं करोतु मे' (मरुत, इन्द्र, बृहस्पति और यह अग्नि मुझे आयु और बल से युक्त करें मुझे आयुष्मान् बनायें)। उसमें मरुत् प्राणों का आधान करते हैं, इन्द्र उसे बल देता है, बृहस्पति ब्रह्म का तेज देता है, अग्नि अन्य सभी कुछ प्रदान करता है। इस प्रकार उसका शरीर सम्पूर्ण बन जाता है और वह पूर्ण जीवन प्राप्त करता है। तीन आवृत्ति कर देवों की प्रार्थना करे, क्योंकि देवता तीन बार कहने पर सत्य के रूप में ग्रहण करते हैं, ऐसा वेद में कहा गया है ॥ ११ ॥