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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 420 of 486

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Page 420

३६६ बौधायन-धर्मसूत्रम् [समये कन्याऽदाने दोषः, स्वयंवरश्च

लज्जाशून्या, गुणहीनाय सर्वगुणाभावेऽपि कतिपयगुणसंपन्नाय, नोपरुन्ध्या-
दिति रजोदर्शनात्प्रागेव दद्यादित्यर्थः ॥ १२ ॥

तदतिक्रमे दोषमाह—

त्रीणि वर्षाण्यृतुमतीं यः कन्यां न प्रयच्छति ।
स तुल्यं भ्रूणहत्यायै दोषमृच्छत्यसंशयम् ॥ १३ ॥

अनु०— जो पिता ऋतुमती कन्या को तीन वर्ष के भीतर विवाह नहीं कर देता, वह निश्चय ही भ्रूणहत्या के समान पाप का भागी होता है ॥ १३ ॥

यतश्चैतदेवं तत ऋतुमत्ययाः प्रागेव दद्यादित्यभिप्रायः ॥ १३ ॥

किं सर्वत्रैतावदेव ? नेत्याह—

न याचते चेदेवं स्याद्याचते चेत्पृथक् यक्।
एकैकस्मिन्नृतौ दोष पातकं मनुरब्रवीत् ॥ १४ ॥

अनु०— इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति उसे विवाह के लिए नहीं मांगता अथवा विवाह के लिए माँगता है, तब भी पिता को वही दोष होता है क्योंकि मनु ने कहा है कि अविवाहिता कन्या का प्रत्येक ऋतुकाल पिता के लिए पातक उत्पन्न करता है।१४।

न याचते न प्रार्थयते चेत् कश्चिदपि ॥ १४ ॥

तत्र प्रसङ्गादिदमन्यदुच्यते—

'त्रीणि वर्षाण्यृतुमती कांक्षेत पितृशासनम् ।
ततश्चतुर्थे वर्ष तु विन्देत सदृशं पतिम् ॥ १५ ॥

अनु०— ऋतुमती कन्या तीन वर्षतक पिता की आज्ञा की प्रतीक्षा करे । उसके बाद चौथे वर्ष में अपने योग्य गुणवान् पति का स्वयं वरण करे ॥ १५ ॥

सादृश्यं जातिगुणादिभिः ॥ १५ ॥

अत एवाऽऽह—

अविद्यमाने सदृशे गुणहीनमपि श्रयेत् ॥ १६ ॥

अनु०— यदि जाति और गुण में समान पुरुष न मिले तो गुणहीन पुरुष को भी पति के रूप में वरण करे ॥ १६ ॥

गुणा अभिजननादयो न जातिः ॥ १६ ॥


१. cf म. स्मृ. ९. ९०.