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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 408 of 486

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Page 408

३५४ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ अनश्नत्पारायणविधिः

कोपिता यान्यकार्याणि भवन्ति, ताभिः पुनीते शुद्धमस्य पूतं ब्रह्म भवति ॥ १० ॥

अनु०— अपने वेद की संहिता का बारह बार अध्ययन करे इससे यदि उसने निषिद्ध समय पर वेदाध्ययन किया हो या गुरुओं के कोप का कारण बना हो अथवा निषिद्ध कर्म किये हों तो उन सभी से वह शुद्ध हो जाता है । उसका वेदज्ञान पवित्र हो जाता है ॥ १० ॥

द्वादशेत्यत्र ऋग्यजुषेष्ठिवत्यध्याहार्यम् । संहिताग्रहणं च पदक्रमनिवृत्त्यर्थम् । तथा च शौनकः—‘अथैके प्राहुरनुसंहितं तत्पारायणं प्रवचनं प्रशस्तम्’ इति । ताभिस्संहिताभिर्द्वादशभिः द्वादशकृत्वोऽभ्यस्ताभिः पुनीते । कस्मात् ? अनध्यायाध्ययननिमित्तात् गुरुकोपनिमित्तादकार्यकरणनिमित्ताच्च ॥ १० ॥

अत ऊर्ध्वं सञ्चयः । ११ ॥

अनु०— उससे अधिक बार पढ़ने पर पुण्य फलों का संचय होता है ॥ ११ ॥

ब्रह्मभिर्हि द्वादशभिः पारायणैः पूते सञ्चयः निःश्रेयसस्य भवति ॥ ११ ॥

अपरा द्वादश वेदसंहिता अधीत्य ताभिरुशनसो लोकमवाप्नोति ॥ १२ ॥ अपरा द्वादश वेदसंहिता अधीत्य ताभिर्बृहस्पतेर्लोकमवाप्नोति ॥ १३ ॥ अपरा द्वादश वेदसंहितां अधीत्य ताभिः प्रजापतेर्लोकमवाप्नोति ॥ १४ ॥ अनश्नन्संहितासहस्रमधीत्य ब्रह्मभूतो विराजो ब्रह्म भवति ॥ १५ ॥

अनु०— यदि और बारह बार वेद की संहिता का अध्ययन करता है तो उससे उशनस् का लोक प्राप्त होता है । उस के बाद भी बारह बार संहिता का अध्ययन करने पर बृहस्पति के लोक की प्राप्ति होती है । उसके बाद भी पुनः बारह बार वेद की संहिता का अध्ययन कर प्रजापति का लोक प्राप्त करता है । उपवास करते हुए एक सहस्र बार संहिता का अध्ययन करने पर ब्रह्म से एक हो जाता है, ब्रह्म की तरह प्रकाश युक्त हो जाता है, स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है ॥ १२–१५ ॥

संहितासहस्रं सहस्रकृत्व इत्यर्थः ॥ १२–१५ ॥

संवत्सरं भैक्षं प्रयुञ्जानो दिव्यं चक्षुर्लभते ॥ १६ ॥

अनु०— यदि एक वर्ष तक भिक्षा ग्रहण करता हुआ वेद का पारायण करता है तो दिव्य दृष्टि प्राप्त करता है ॥ १६ ॥