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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 404 of 486

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Page 404
३५०बौधायन-धर्मसूत्रम्[वाक्यप्रायश्चित्तम्]

विपरीतं यवमध्यम् ॥ ३५ ॥

अनु०—इसके विपरीत यवमध्य चान्द्रायण होता है ॥ ३५ ॥
टि०—यह चान्द्रायण व्रत अमावास्या से आरम्भ किया जाता है और अमावास्या को ही समाप्त किया जाता है। जिस प्रकार यव का मध्य भाग मोटा होता है इसी प्रकार इसमें भी व्रत के मध्य में चन्द्रमा की कला के अनुसार अधिकतम ग्रास का आहार होता है।

अमावास्योपक्रमममावास्यान्तमित्यर्थः । अत्र हि पक्षयोरुपवासयोः क्रियमाणयोश्चन्द्रगतिरप्युपसृता भवति ॥ ३५ ॥


अतोऽन्यतरच्चरित्वा सर्वेभ्यः पातकेभ्यः पापकृच्छुद्धो भवति ॥३६॥

अनु०—पाप करने वाला इन दोनों व्रतों में से कोई एक व्रत कर सभी पापों से शुद्ध हो जाता है ॥ ३६ ॥

मुक्तो भवतीत्युक्तं भवति ॥ ३६ ॥
न केवलं प्रायश्चित्तार्थमेवाऽन्यतरस्य चान्द्रायणस्य चरणम्, किं तर्हि ?


कामाय कामायैतदाहार्यमित्याचक्षते ॥ ३७ ॥

अनु०—सभी इच्छाओं की पूर्ति के लिए यह चान्द्रायण व्रत किया जा सकता है ऐसा कहा गया है ॥ ३७ ॥

अत्रैकः कामशब्दः कर्मवचनः । अपरो भाववचनः । काम्यमानाय फलायेत्यर्थः । यद्वा-वीप्सावचनमेतत् । अतश्च सर्वाभिप्रायकमेतदित्युक्तं भवति ॥३७॥
तदाह—


यं कामं कामयते तमेतेनाऽऽप्नोति ॥ ३८ ॥

अनु०—मनुष्य जिस फल की इच्छा करता है वह फल चान्द्रायण व्रत से प्राप्त कर लेता है ॥ ३८ ॥

नाऽत्र तिरोहितमस्ति किञ्चित् ॥ ३८ ॥


एतेन वा ऋषय आत्मानं शोधयित्वा पुरा कर्माण्यसाधयन् ॥ ३९ ॥

अनु०—प्राचीन काल में ऋषियों ने इस चान्द्रायण व्रत से ही अपने को पवित्र किया और अपने सभी कर्मों को पूरा किया ॥ ३९ ॥

कर्माण्यग्न्याधेयादीनि । उक्तं चैतत्-अग्नीनाधास्यमानः प्राज्यमात्मानं कुर्वीतिति । किमर्थमेतत् ? इदानींतना अपि कथं रोचयेरन्, ततोऽनुतिष्ठेयुरिति ॥ ३९ ॥