बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in contextषोडशः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने नवमोऽध्यायः २७९
अनु०—वेद के स्वाध्याय द्वारा ऋषियों की पूजा कर, सोमयज्ञ के सम्पादन से इन्द्र की पूजा कर, प्रजा उत्पन्न कर अपने पूर्वज पितरों को प्रसन्न कर वह ऋणों से मुक्त हो स्वर्ग में सुख प्राप्त करता है ॥ ५ ॥
सोमेन सोमयागेन ॥ ५ ॥
आयुषा युक्तः प्रजामुत्पादयेदित्य उक्तम् । तत्राह—
'पुत्रेण लोकान् जयति^२ पौत्रेणाऽमृतमश्नुते ।
अथ पुत्रस्य पौत्रेण नाकमेवाऽधिरोहतीति ॥ ६ ॥
अनु०—पुत्र की उत्पत्ति से पुरुष इन लोकों को जीत लेता है, पौत्र के माध्यम से अमृत प्राप्त करता है, और पुत्र के पौत्र को देखकर वह परम स्वर्ग ही प्राप्त करता है, ऐसा श्रुति में कहा गया है ॥ ६ ॥
पुत्रेण दृष्टेन । तत्पुत्रेण तत्पौत्रेण इत्यत्रापि दृष्टेनेति शेषः । अमृतं देवैस्सा-
युज्यम् । नाकं कमिति सुखम्, तदभावो दुःखम् । एतत्प्रतिषिध्यते । दुःखाननु-
विद्धं सुखं ब्रह्मणः पदमिति यावत् । 'दिवि मोदते' इति सिद्धे पुनरुपादानं
बहुपुत्रोत्पादनार्थम् । यथाहः पौराणिकाः—
एष्टव्या बहवः पुत्राः यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ।
^३यजेत वाऽश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥ इति ॥ ६ ॥
अथेदानीं ऋणसंयोगतदपाकरणे श्रुतिप्रमाणं इत्याह—
विज्ञायते च—^४'जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिर् ऋणवा जायते
ब्रह्मचर्येणर्षिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्य इति । एवमृणसंयोगं
वेदो दर्शयति ॥ ७ ॥
अनु०—वेद के अन्तर्गत कहा गया है कि जन्म से ही ब्राह्मण तीन प्रकार के
ऋणों से युक्त होकर उत्पन्न होता है, ऋषियों के लिए ब्रह्मचर्य के ऋण से, देवों
के लिए यज्ञ के ऋण से तथा पुत्रोत्पत्ति के लिए पितरों के ऋण से ऋणी होता है ।
इस प्रकार वेद ने भी ऋणों का संयोग दिखाया है ॥ ७ ॥
तदपाकरणं चेति शेषः ॥ ७ ॥
१. cf. मनु. ९. १३७.
२. ह्यानन्त्यमश्नुते. इति. आ. इ. ग. पुस्तकेषु, मनावपि ॥
३. गौरीं वा वरयेत्कन्याम् इति घ. पु.
४. See. तै. सं. ६. ३. ११.