Skip to content
SarvaKosh
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 327 of 486

Read in context
Page 327

पञ्चदशः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने अष्टमोऽध्यायः २७५

यातुधानाः पिशाचाश्च प्रतिलुम्पन्ति तद्धविः ।
तिलदाने ह्यदायादास्तथा क्रोधवशेऽसुराः ॥ ४ ॥

अनु०—भोजन के स्थान पर तथा आसनों पर तिल न बिखरने पर उस हवि को यातुधान और पिशाच, जिनका कोई अंश नहीं होता, छीन लेते हैं और श्राद्ध-कर्ता के क्रोध में आने पर उस हवि को असुर ले लेते हैं ॥ ४ ॥

भोजनस्थानेष्वासनेषु च तिलविकिरणस्याऽक्रोधस्य च प्रशंसैषा ॥ ४ ॥

काषायवासा यान्कुरुते जपहोमप्रतिग्रहान् ।
न तद्देवगमं भवति हव्यकव्येषु यद्धविः ॥ ५ ॥

अनु०—लाल या काषाय वस्त्र धारण कर मनुष्य जो प्रार्थनाएं या होम करता है अथवा जो दान लेता है, वह देवों के समीप नहीं पहुँचता उसी प्रकार उसके द्वारा यज्ञ में दी गयी हवि भी देवों को नहीं मिलती ॥ ५ ॥

टि०—तात्पर्य यह है कि देवकार्य और पितृकर्म में यजमान को श्वेत वस्त्र ही धारण करना चाहिए। गोविन्द के अनुसार काषाय वस्त्र धारण करने वाले संन्यासियों को भी पितृकर्म के अवसर पर निमन्त्रित नहीं करना चाहिए।

दैवे कर्मणि पित्र्ये च काषायवासोनिषेधः श्वेतवाससा भवितव्यमिति विधानार्थम्। किञ्च—काषायवाससो यतीश्वराः। तेऽपि पित्र्ये दैवे कर्मणि च जपहोमप्रतिग्रहान् कुर्वते। तद्देवगमं पितृगमं च न भवतीति शेषः। हव्यं देवदैवत्यं कव्यं पितृदैवत्यम् ॥ ५ ॥

यच्च दत्तमनाङ्गुष्ठं यच्चैव प्रतिगृह्यते ।
आचामति च यस्तिष्ठन् न स तेन समृध्यत इति ॥ ६ ॥

अनु०—जो दान अंगूठे से स्पर्श किये बिना दिया जाता है और जो दान अंगूठे से स्पर्श के बिना ग्रहण किया जाता है और जो आचमन खड़े होकर किया जाता है उससे कर्ता को कोई फल नहीं प्राप्त होता—वह लाभान्वित नहीं होता है ॥ ६ ॥

प्रदानप्रतिग्रहयोरङ्गुष्ठस्याऽबहिर्भावार्थः, तिष्ठतः आचमननिषेधार्थश्चाऽयं श्लोकः ॥ ६ ॥

आद्यन्तयोरपां प्रदानं सर्वत्र ॥ ७ ॥

अनु०—दान में आरम्भ और अन्त में सर्वत्र जलदान करना चाहिए ॥ ७ ॥

सर्वत्र दाने श्रद्धानेनाऽऽदावन्ते च जलदानं कर्त्तव्यम्। तथा च गौतमः—'भिक्षादानमत्पूर्वम्। ददातिषु चैवं धर्म्येषु' इति ॥ ७ ॥